बाघ मरा, फ़ाइल चली – सिस्टम जिंदा हैं.

*बाघ मरा, फ़ाइल चली – सिस्टम जिंदा हैं.!*

 

*कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में मौत का सन्नाटा:*

 

*करोड़ों खर्च फिर भी नहीं बच पा रहे बाघ और वन्यजीव*

 

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/ कान्हा राष्ट्रीय उद्यान जो अपनी प्राकृतिक सौंदर्यता और बाघ के साथ- साथ अन्य जंगली जीवों के लिए पहचाना जाता हैं। जहां पर देश विदेश से सैलानी आते हैं और प्राकर्तिक सौंदर्यता के साथ ही साथ वन्य जीवों को देखने का लुफ़्त भी उठाते हैं। पंरतु कान्हा नेशनल पार्क काफी लम्बे समय से बदनाम हैं वन्य जीवों की असमय की मौत और मौत के बाद वहां पर पसर जाने वाले सन्नाटे से नेशनल पार्क में प्रतिवर्ष करोड़ों अरबों रुपए का बजट आता हैं और पार्क के साथ ही साथ पार्क में विचरण करने वाले वन्यजीवों के नाम से सारे के सारे रुपए खर्च किए जाते हैं फिर भी प्रबंधन की लापरवाही और उदासीनता के चलते नहीं बच पा रहे हैं बाघ और वन्यजीव।

राष्ट्रीय उद्यानों में लगातार हो रही बाघों और अन्य जंगली जानवरों की मौतों ने वन विभाग और सरकारी दावों की पोल खोल दी है। संरक्षण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जंगलों में बाघ असुरक्षित हैं और वन्यजीव मौत के मुहाने पर खड़े हैं।

जानकारों के अनुसार शिकारियों की सक्रियता, पानी और भोजन की कमी, आपसी संघर्ष, बीमारी और समय पर इलाज न मिल पाना मौतों के प्रमुख कारण हैं। इसके बावजूद विभागीय अधिकारी फाइलों में ही *“टाइगर प्रोटेक्शन”* का खेल खेलते नज़र आ रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में न तो पर्याप्त फील्ड स्टाफ है, न ही नियमित गश्त। आधुनिक कैमरे, ड्रोन और निगरानी सिस्टम काग़ज़ों में तो हैं, लेकिन जंगल में उनकी मौजूदगी नाममात्र की है। सवाल आज भी जस के तस यह बनें हुए है कि जब हर मौत के बाद जांच बैठती है, तो फिर आख़िर दोषी तय क्यों नहीं होते?

पर्यावरणविदों का कहना है कि यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी है। जहां जिम्मेदारी तय करने की बजाय लीपापोती को प्राथमिकता दी जाती है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय उद्यान केवल नाम के रह जाएंगे और बाघ तस्वीरों में ही दिखेंगे।

 

*बाघ मरा, फाइल चली—सिस्टम जिंदा है!*

 

राष्ट्रीय उद्यान में बाघ मरा है… घबराइए मत!

क्योंकि विभाग जिंदा है, सिस्टम जिंदा है और फाइलें पूरी तरह सुरक्षित हैं।

बाघ की जान जाए तो जाए,

पर मीटिंग के समय चाय नाश्ता समय पर होना चाहिए।

प्रेस नोट में “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” भी ज़रूर लिखा जाना चाहिए।

और जांच समिति तुरंत गठित भी होनी चाहिए —

जिसकी रिपोर्ट आने से पहले अगला बाघ तैयार मिले।

*करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं—*

*किस पर?*

 

बाघ की सुरक्षा पर नहीं,

बल्कि उसके मरने के बाद बयान देने की ट्रेनिंग पर।

 

*जंगल में शिकारी बेखौफ हैं,*

 

क्योंकि उन्हें पता है—

रात में गोली चलेगी

और सुबह अफसर कहेंगे,

“प्रथम दृष्टया मामला आपसी संघर्ष का लग रहा है।”

 

*बाघ पूछ रहा है—*

 

“अगर मेरी सुरक्षा नहीं कर सकते,

तो कम से कम मेरे नाम पर बजट खाना तो बंद कर दो!”

लेकिन सिस्टम मुस्कुराता है,

कहता है—

“चिंता मत करो,

अगले साल फिर करोड़ों आएंगे…

और तुम जैसे किसी और बाघ की शहादत से

नई योजना लॉन्च होगी।”

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