माँ रेवा की जयंती पर विशेष…. माँ नर्मदा जयंती: आज दीप बहे, कल आँसू न बहें…

 

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। आज माँ नर्मदा जयंती है। घाटों पर दीप जल रहे हैं, आरती की लौ लहरों पर थिरक रही है, “नर्मदे हर” के जयकारों से पूरा अंचल गूंज रहा है। ऐसा लगता है मानो माँ स्वयं अपने भक्तों को आशीर्वाद देने उतरी हों।
लेकिन इन्हीं लहरों के भीतर एक मौन पीड़ा भी बह रही है… जिसे शायद हम देखना नहीं चाहते।
माँ नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं हैं।
वह माँ हैं—जो पीने को जल देती हैं, खेतों को हरियाली देती हैं, जीवन को दिशा देती हैं।
फिर भी आज वही माँ प्लास्टिक, गंदगी, सीवर और रेत माफियाओं के जख्म सह रही हैं।
आज पूजा, कल वही ज़ुल्म?
जिन हाथों से आज लोग दीपदान कर रहे हैं,
क्या उन्हीं हाथों से कल नदी में कचरा नहीं फेंका जाएगा?
जिन घाटों पर आज आरती उतरेगी,
क्या वहीं कल अवैध रेत के ट्रक नहीं दौड़ेंगे?
यह सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं,
पूरे समाज और प्रशासन की आत्मा से हैं।
माँ का आँचल छलनी है
कहीं नर्मदा का किनारा कट रहा है,
कहीं जल गंदा हो रहा है,
कहीं रेत की भूख में नदी का सीना चीर दिया गया है।
और हम… हम बस साल में एक दिन माँ को याद कर लेते हैं।
अगर माँ बोल पातीं,
तो शायद पूछतीं—
“क्या मेरी आरती ही काफी है?
या मेरे घावों पर मरहम भी रखोगे?”
जयंती नहीं, चेतावनी है यह दिन
माँ नर्मदा जयंती केवल पर्व नहीं,
यह चेतावनी है।
अगर आज भी नहीं जागे,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।
अब समय है—
पूजा के साथ संरक्षण का
भक्ति के साथ जिम्मेदारी का
जयकारों के साथ कठोर कार्रवाई का
प्रशासन से अपेक्षा है कि
नर्मदा को सिर्फ मंचों से नहीं, मैदान में उतरकर बचाया जाए।
और जनता से अपील है कि
माँ को सिर्फ पूजें नहीं, बचाएँ भी।
आज अगर हमने माँ नर्मदा का मान रखा,
तो कल माँ हमारी आने वाली पीढ़ियों का जीवन बचाएंगी।
नर्मदे हर… लेकिन केवल शब्दों में नहीं, कर्मों में भी।
हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे
निवेदक ;- मुकेश श्रीवास

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