रेवांचल टाइम्स मंडला। जिले में मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम को संचालित करने वाले रसोईयों का असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। रसोईया उत्थान संघ समिति के बैनर तले जिलेभर में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया है। संगठन के संस्थापक पी.डी. खैरवार के मार्गदर्शन में रसोईयों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है और अब सरकार के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की रणनीति भी बनाई जा रही है।
इसी क्रम में 15 मार्च को बीजाडांडी और मवई में तथा 23 मार्च को घुघरी विकासखंड के सलवाह में रसोईयों द्वारा शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किया गया। यह आंदोलन अब विकासखंड स्तर पर लगातार जारी रहेगा। धरना-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में रसोईयों ने भाग लिया और सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। प्रदर्शन के दौरान रसोईयों ने आरोप लगाया कि सरकार उनके प्रति अमानवीय रवैया अपना रही है और उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
धरने में यह प्रमुख रूप से चर्चा की गई कि रसोईये पिछले लगभग चार दशकों से मध्यान्ह भोजन योजना के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें आज तक स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया है। उन्हें अस्थायी कर्मी बनाकर रखा गया है, जिससे उनका लगातार शोषण हो रहा है। संगठन ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने जल्द ही कोई ठोस नीति नहीं बनाई, तो वे न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।
संगठन ने यह भी निर्णय लिया है कि आगामी विधानसभा सत्र में रसोईयों की समस्याओं को उठाने के लिए क्षेत्रीय विधायकों से संपर्क कर प्रश्न दर्ज कराया जाएगा। साथ ही रसोईयों के हित में स्थायी नियम बनाने की मांग को लगातार उठाया जाएगा।
रसोईयों की प्रमुख समस्याओं में सबसे बड़ा मुद्दा कम मानदेय का है। वर्तमान में उन्हें मात्र चार हजार रुपये प्रतिमाह दिया जाता है, जो बढ़ती महंगाई के दौर में बेहद कम है। इसके अलावा समय पर मानदेय का भुगतान नहीं होना भी एक समस्या है। कई बार काम करने के बाद भी महीनों तक भुगतान लंबित रहता है।
रसोईयों ने यह भी बताया कि 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर उन्हें कार्य से अलग कर दिया जाता है, लेकिन इसके बाद उन्हें किसी प्रकार की पेंशन, बीमा या आर्थिक सहायता नहीं दी जाती। इससे उनके सामने जीवन-निर्वाह का संकट खड़ा हो जाता है। वहीं काम के घंटों के हिसाब से भी उन्हें बेहद कम मानदेय दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त गर्मियों की छुट्टियों में उन्हें बेरोजगार कर दिया जाता है, जिससे उनकी आय पूरी तरह बंद हो जाती है। स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने, स्व-सहायता समूह से नहीं जुड़े होने या “एक शाला, एक परिसर” जैसी नीतियों के चलते भी कई रसोईयों को काम से बाहर कर दिया जाता है। कई स्कूलों में पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी उनकी कार्य परिस्थितियों को और कठिन बना देता है।
धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व जिला कार्यकारिणी के जयंती अहिरवार, सुरेश बघेल, कुंवर सिंह मरकाम, गंगोत्री विश्वकर्मा, गणेश धुर्वे, कृष्णा धार्वैया, रम्मू साहू और दिनेश बघेल ने किया। सभी ने एक स्वर में चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द उनकी मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
रसोईयों का यह आंदोलन अब जिले में एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है, जिससे आने वाले समय में प्रशासन और सरकार की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।