ग्राम पंचायत लफरा में भ्रष्टाचार पर डाला जा रहा पर्दा 

5 महीने से दबाई जा रही जांच,

 

रेवांचल टाइम्स मंडला ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार किया जाना अब आम बात हो चुकी है मनमाने बिलो में भुगतान करना बिना जी एस टी के धुंधले बिलो पर भुगतान कर दिया जाता है निर्माण कार्यों की गुणवत्ता किसी से छुपी नहीं है इन्हें पता है अगर शिकायत होगी तब देखा जायेगा शिकायत में कार्यवाही को लेकर भी डर नही है क्योंकि इन्हें पता लोग शिकायत कर भूल जाते है और जांच अधिकारी को जांच कर कागजो का पेट भर दिया जाता है और कार्यवाही शून्य हो जाती है

 

ऐसा ही मामला जिले के जनपद पंचायत बिछिया अंतर्गत ग्राम पंचायत लफरा में भ्रष्टाचार का मामला अब केवल स्थानीय अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और कथित संरक्षण का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार ग्रामीणों द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद जांच का ठंडे बस्ते में चले जाना यह संकेत दे रहा है कि कहीं न कहीं पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।

ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक स्थापित “प्रणाली” बन चुका है, और लफरा इसका ताजा उदाहरण है। आरोप है कि पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर जमकर बंदरबांट की गई। फर्जी मस्टर रोल भरकर मजदूरी निकाली गई, बिना कार्य के बिलों का भुगतान किया गया और निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का खुलेआम इस्तेमाल हुआ। यह सब कुछ कथित रूप से सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री की मिलीभगत से किया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत के जिम्मेदारों को इस बात का पूरा भरोसा है कि शिकायतें केवल कागजों तक सीमित रहेंगी और कार्रवाई का डर उन्हें नहीं है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार लगातार जारी है और जिम्मेदार बेखौफ हैं।

इस पूरे मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्राम पंचायत लफरा के ग्रामीणों ने एक-दो नहीं, बल्कि सात बार जनसुनवाई में आवेदन देकर शिकायत दर्ज कराई। निरंजन प्रसाद कार्तिकेय सहित कई ग्रामीणों ने प्रशासन से गुहार लगाई कि पंचायत में हुए भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

लगातार दबाव के बाद 4 नवंबर 2025 को प्रशासन हरकत में आया और जांच समिति का गठन किया गया। इस समिति में प्रवीण श्रीवास   लेखाधिकारी,जिला पंचायत मंडला अनुपम दुबे  अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी जनपद पंचायत मंडला और प्रदीप ठाकुर विकासखण्ड समन्वयक सामाजिक अंकेक्षण जिला मंडला को शामिल किया गया। समिति को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वह सात दिनों के भीतर जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत मंडला को सौंपे।

लेकिन यहां से शुरू होता है असली खेल।

निर्देशों के मुताबिक 7 दिन में पूरी होने वाली जांच आज लगभग 5 महीने बाद भी अधर में लटकी हुई है। न तो जांच रिपोर्ट सामने आई और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई हुई। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जांच जानबूझकर लटकाई जा रही है क्या किसी को बचाने के लिए समय खींचा जा रहा है

ग्रामीणों का आरोप है कि जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं निभाई जाती हैं। अधिकारी आते हैं, कागज देखते हैं और जांच रिपोर्ट तैयार ही नहीं की जाती, और अगर की भी जाती है तो उसे दबा दिया जाता है।

लफरा के मामले में भी यही तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। जांच समिति की चुप्पी और प्रशासन की निष्क्रियता यह संकेत दे रही है कि मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि संभावित मिलीभगत का हो सकता है।

गुस्साए ग्रामीणों ने एक बार फिर जनसुनवाई में आवेदन देकर निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई की मांग की है। उनका साफ कहना है कि अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

यह मामला केवल एक पंचायत का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की साख का सवाल बन गया है। यदि सात-सात बार शिकायत करने के बाद भी जांच नहीं होती, तो आम जनता आखिर किस पर भरोसा करे। क्या जनसुनवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है

प्रशासन की भूमिका पर भी  सवाल खड़े हो रहे हैं। जांच समिति को समय सीमा देने के बावजूद रिपोर्ट का न आना यह दर्शाता है कि या तो अधिकारियों में जवाबदेही की कमी है या फिर वे किसी दबाव में काम कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक इस तरह के मामलों में कमी आना मुश्किल है। जांच को समयबद्ध बनाना और दोषियों पर कार्रवाई करना बेहद जरूरी है, वरना भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी होती जाएंगी।

फिलहाल लफरा के ग्रामीण न्याय की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन जिस तरह से जांच को टाला जा रहा है, उससे उनकी उम्मीदें कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में कब तक चुप्पी साधे रहता है और क्या वाकई दोषियों पर कोई कार्रवाई होती है या यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।

एक बात तो साफ है—अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार की जीत नहीं होगी, बल्कि  सिस्टम की हार मानी जायगी।

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