दैनिक रेवांचल टाईम्स – ज़रा एक पल के लिए आँखें बंद कीजिए,और सोचिए अगर नदियाँ सूख जाएँ, पेड़ खत्म हो जाएँ,हवा ज़हरीली हो जाए,तो क्या हम जीवित रह पाएँगे?उत्तर होगा नहीं।
क्योंकि प्रकृति ही जीवन है, और जीवन ही प्रकृति है।
*लेकिन विडंबना देखिए*
जिस प्रकृति ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा, हमें हर सुख-सुविधा दी आज हम उसी प्रकृति को नष्ट करने में लगे हुए हैं।हम पेड़ काट रहे हैं,हम नदियों को गंदा कर रहे हैं,हम हवा में ज़हर घोल रहे हैं,और यह सब हम किसके लिए कर रहे हैं?
थोड़े से विकास, थोड़ी सी सुविधा, और थोड़े से लालच के लिए।
पृथ्वी आज हमें चेतावनी दे रही है।
कभी भीषण गर्मी बनकर,
कभी विनाशकारी बाढ़ बनकर,कभी सूखा और तूफान बनकर।
यह कोई सामान्य घटनाएँ नहीं हैं,ये प्रकृति की चीख हैं,जो हमसे कह रही है,
अब भी संभल जाओ नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।
अगर आज हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी,वे पूछेंगी।
कि जब सब कुछ ठीक किया जा सकता था, तब तुम चुप क्यों थे?क्या हमारे पास उस सवाल का कोई जवाब होगा?शायद नहीं,
इसलिए आज हमें सिर्फ सोचने की नहीं,कुछ करने की जरूरत है।
*हमें अपने जीवन में बदलाव लाना होगा*
एक पेड़ काटने से पहले दस पेड़ लगाने होंगे,पानी की हर बूंद की कीमत समझनी होगी,प्लास्टिक को “ना” कहना होगा,और प्रकृति के साथ दोस्ती करनी होगी, दुश्मनी नहीं।
*याद रखिए*
हम प्रकृति को नहीं बचा रहे,हम खुद को बचा रहे हैं।
बदलाव किसी बड़े अभियान से नहीं,बल्कि हमारे छोटे-छोटे कदमों से शुरू होता है।
अगर हर व्यक्ति आज एक संकल्प ले ले तो पूरी दुनिया बदल सकती है।
बात छोटी है मगर एक बार सोचना जरूर।
*तो आइए आज हम सब मिलकर एक वचन लें*
हम प्रकृति का सम्मान करेंगे
हम उसे नुकसान नहीं पहुँचाएंगे,
और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे,
जब तक पेड़ हरे-भरे रहेंगे,
तब तक जीवन के रंग सजे रहेंगे।
प्रकृति को जो अपनाएगा,
वही सच्चा सुख पाएगा।
आजाद कलम
सरवर खान