(दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला | विशेष रिपोर्ट)“नल लगा है, फोटो खिंच गई, फाइल बंद… अब पानी आए या ना आए, किसे फर्क पड़ता है?”
मंडला जिले में “हर घर जल” योजना की जमीनी हकीकत कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश कर रही है। गांव-गांव में घरों तक पाइपलाइन और नल तो पहुंच गए, लेकिन पानी अब भी लोगों के लिए सपना बना हुआ है।
सरकारी दावे कहते हैं—
“हर घर तक नल और जल दोनों पहुंच चुका है…”
लेकिन हकीकत यह है कि—
नल सूखे हैं
टंकियां खाली हैं
और ग्रामीण बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं
जमीन बनाम कागज की सच्चाई
कई गांवों में केवल योजना का “इंफ्रास्ट्रक्चर” खड़ा कर दिया गया—
नल लगाए गए
टंकी बनाई गई
फोटो खिंचवाए गए
और फाइलें बंद कर दी गईं
पर असली सवाल—पानी कब आएगा?—आज भी अनुत्तरित है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
क्या सिर्फ नल लगाना ही योजना की सफलता है?
क्या बिना पानी के नल, विकास का प्रमाण बन सकता है?
क्या अधिकारी सिर्फ रिपोर्ट और फोटो तक ही सीमित रहेंगे?
“मंडला मॉडल” या “सूखे नलों का सच”?
ग्रामीणों के बीच अब एक कड़वी कहावत चल पड़ी है—
“जहां नल दिखे, समझ जाओ पानी नहीं आएगा!”
“हर घर जल” अब बदलकर—
“हर घर नल, पानी शायद ही मिले कल”
“हर घर नल, बस कागजों में हलचल”
जिम्मेदारों की चुप्पी आखिर क्यो
जिम्मेदार विभाग और अधिकारी या तो चुप हैं या फिर वही पुराना जवाब—
“काम प्रगति पर है…”
लेकिन सवाल यह है कि—
यह “प्रगति” आखिर कब पूरी होगी?
और तब तक जनता प्यास से कब तक जूझेगी?
वही पी एच ई मंत्री का जिला, फिर भी लोग प्यासे?
बड़ी विडंबना यह है कि यह वही जिला है जहां विभागीय मंत्री सम्पतिया उईके का सीधा प्रभाव माना जाता है। इसके बावजूद अगर हालात ऐसे हैं, कि हर घर जल हर घर नल केवल सपना बन के रहता जा रहा है और जल निगम के डी एम को यह भी जानकारी नही है कि जिले के कितने ग्रामों में निवासरत ग्रामीणों के घर घर तक पानी पहुँच रहा हैं या नही, तो सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं।
चेतावनी साफ है
अगर जिम्मेदार अब भी नहीं जागे, तो—
यह योजना “जनकल्याण” नहीं, बल्कि “जन-भ्रम” बनकर रह जाएगी।
और मंडला की पहचान बन जाएगी—
“सूखे नलों का मॉडल जिला”
दैनिक रेवांचल टाइम्स इस मुद्दे को लगातार उठाता रहेगा…
क्योंकि सवाल सिर्फ योजना का नहीं, जनता की प्यास और हक का है।