शिक्षक या संदिग्ध? मध्यप्रदेश में ‘गुरु’ बना निगरानी तंत्र का शिकार

सीसीटीवी, जीपीएस ऐप, फोटो रिपोर्टिंग और बेतुके आदेशों के बोझ तले दबा शिक्षक—न शिक्षा बची, न सम्मान

रेवांचल टाईम्स – मध्यप्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की स्थिति दिन-ब-दिन संकटग्रस्त होती जा रही है। जिन शिक्षकों को एक समय समाज “गुरु” कहकर सम्मानित करता था, आज उन्हें स्कूलों में पढ़ाने से अधिक, अपनी उपस्थिति के सबूत, कक्षा की तस्वीरें और सरकारी आदेशों की पूर्ति में वक्त गंवाना पड़ रहा है।
शिक्षक संघों और फील्ड रिपोर्ट्स के अनुसार, अब शिक्षण एक रचनात्मक कार्य नहीं, बल्कि सतत निगरानी में जीवित रहने की प्रशासनिक कवायद बन गया है।
डिजिटल निगरानी का दायरा
मध्यप्रदेश में शिक्षक को स्कूल पहुंचते ही जी .पी. एस आधारित अटेंडेंस एप्प से उपस्थिति दर्ज करनी होती है। फिर दिनभर की गतिविधियों की फोटो—कक्षा, भोजन, खेल, नामांकन, स्वच्छता, तिरंगा यात्रा आदि—व्हाट्सएप ग्रुपों या शिक्षा पोर्टल पर भेजनी होती है। शाम तक शिक्षक को यह सोचते रहना पड़ता है कि कहीं कोई रिपोर्ट छूट तो नहीं गई।
“अब पढ़ाने से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है फोटो भेजना, नहीं तो मैसेज और नोटिस आने लगते हैं” — एक सरकारी स्कूल शिक्षक को
प्रशासनिक भोपाल स्तर के आदेशों का दबाव एवम जिले ओर ब्लॉक स्तर के आदेशो के पालन का दबाव
1_ जी.पी. एस .उपस्थिति अनिवार्य अटेंडेंस आदेश, 2023
2_ भोजन वितरण की फोटो राज्य शिक्षा केंद्र आदेश, 12/08/2022
3_ निरीक्षण: हाजिरी, ब्लैकबोर्ड, रजिस्टर, एफ एल एन गतिविधियाँ की फोटो हर चीज की फोटो ज़िला शिक्षा अधिकारी /डी ई सी के निर्देश के पालन की फोटो बी आर सी /बी ए सी /सी ए सी साथ मे सकुल ओर जनशिक्षक केन्द्र तथा डाईट के प्रशिक्षण कार्यक्रम की गतिविधियो की फोटो
4 हर राष्ट्रीय अभियान की रिपोर्टिंग शिक्षा पोर्टल इवेंट्स
‘गुरु’ बना रिपोर्टिंग क्लर्क
शिक्षकों से शिक्षण कार्य के साथ-साथ नामांकन वी आर सर्वे साक्षरता सर्वे अभियान, रैलियाँ, बी.एल.ओ टीकाकरण, पंचायत ड्यूटी, बहत सारे सर्वेक्षण आदि दर्जनों गैर-शिक्षण कार्य भी कराए जा रहे हैं।
शिक्षक अब छात्रों को पढ़ाने के बजाय खुद को दोषमुक्त सिद्ध करने में व्यस्त है। यह प्रणाली उन्हें जवाबदेह नहीं, आशंकित बना रही है।
2023 की एक शिक्षक सर्वे रिपोर्ट में बताया गया कि
82% शिक्षक मानते हैं कि रिपोर्टिंग और प्रशासनिक कार्यों के कारण उनका शिक्षण कार्य प्रभावित होता है।
क्या यही है नई शिक्षा नीति का ‘प्रेरक शिक्षक’?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षक को नवाचार और प्रेरणा का केंद्र मानती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर स्थिति उलट है।
आज शिक्षक डर, निरीक्षण और रिपोर्टिंग के बीच जूझ रहा है।
भरोसे की जगह संदेह और सम्मान की जगह आदेशों ने ले ली है।
शिक्षक ये चाहते हैं:
1. शिक्षकों से गैर-शिक्षण कार्य हटाए जाएं
2. रिपोर्टिंग और निरीक्षण की प्रक्रिया सरल, सम्मानजनक और तर्कसंगत हो
3. शिक्षक को सम्मान और विश्वास के साथ देखा जाए
4. “डर” के बजाय “सहयोग” की नीति अपनाई जाए
जहां डर होता है, वहां समर्पण नहीं होता — शिक्षक को ‘संदेह’ नहीं, ‘सम्मान’ चाहिए।अन्त में मेरा एक ख़्वाब है कि हमारी शिक्षा नीति एसी हो जिसमें हम हर बच्चे को न केवल रोज़गार प्राप्त करने वालों की लाइन में खड़ा देखें बल्कि हमारे स्कूल,कॉलेज से निकलने वाला हर बच्चा हज़ारों हज़ार लोगों को रोज़गार देने के क़ाबिल बने।
हर अधिकारीगण केवल डरा कर अपना काम ए अपने हर आदेश का पालन कराना सुनिश्चित करना चाहता है पर सहयोग अपेक्षित नही है किसी भी स्तर पर
शिक्षक डर भय मे जीवित रहने वाला बनता जा रहे इन सब के बाबजूद शिक्षक हर आदेश का पालन समय पर कर रहा है इस के बाद भी समाज ओर अपने खुद के विभाग मे सम्मान जनक व्यहवार नही पा रहा है अपमान तिरस्कार एवम हीनभाव की द्रष्टि से देखा जाना वाला प्राणीमात्र बन गये है!

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