महिला एवं बाल विकास विभाग में रिश्वतखोरी की हकीकत, पद और शक्ति का घिनौना खेल उजागर।
परियोजना अधिकारी सीमा पटेल और तीन सुपरवाइजरों ने 50 हजार रुपये की मांग, 20 हजार रंगे हाथ पकड़े गए।
लोकायुक्त जबलपुर की सतर्कता ने भ्रष्टाचार का जाल तोड़ा, लेकिन सवाल वही….सिस्टम में सुधार कब होगा?
बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाला विभाग खुद लालच की आग में झुलस गया।
यह घटना साफ कर देती है कि सत्ता और पद का दुरुपयोग कितनी आसानी से हमारी उम्मीदों को कुचल सकता है।
छिंदवाड़ा। जो विभाग बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करने का दावा करता है, वही विभाग अब भ्रष्टाचार के झूलते तख्तों पर खुद थिरकता नजर आया। आंगनबाड़ी सहायिका बनने की ख्वाहिश रखने वाली पूजा उइके के ज्वॉइनिंग लेटर में छुपा था एक “इनाम”….20,000 रुपये की रिश्वत, जिसे परियोजना अधिकारी सीमा पटेल और उनके महिला साथियों ने हड़प लिया।
लोकायुक्त जबलपुर की टीम ने छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव कार्यालय में ट्रेप ऑपरेशन कर यह साबित कर दिया कि पद और शक्ति के बीच रिश्वत का घिनौना खेल चल रहा है। आरती आम्रवंशी को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ लिया गया, लेकिन सवाल यह है कि इस विभाग में कितनी और कितनी कहानी ऐसी छुपी बैठी होंगी, जिनकी आवाज दबा दी जाती है।
शिकायतकर्ता पूजा उइके को पद मिला, लेकिन पद मिलने से पहले ही रिश्वत का जाल तैयार था। परियोजना अधिकारी सीमा पटेल ने लक्ष्मी पंडोले और बिंदू माहौर के साथ मिलकर 50,000 रुपये की मांग की थी….पद की “इज्जत” के नाम पर। लोकायुक्त की सतर्कता ने इसे उजागर कर दिया, वरना यह रकम कभी भी उनके हाथ से कानूनी दायरे में नहीं आती।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधन) 2018 की धारा 7, 13(1)B, 13(2), 12 के तहत कार्रवाई तो शुरू हो गई है, लेकिन सवाल यह है….क्या सिस्टम में सच में सुधार होगा, या यही सिलसिला चलता रहेगा? ट्रेप ऑपरेशन दल ने साबित कर दिया कि पुलिस की निगरानी और लोकायुक्त की सक्रियता ही फिलहाल एकमात्र चश्मा है जो इस घिनौने खेल को उजागर कर सकता है।
आरोपी महिलाएं और उनकी करतूतें:
सीमा पटेल, परियोजना अधिकारी, उम्र 40….वो शक्ति का पावरपैक हैं या रिश्वत का नेटवर्क?
आरती आम्रवंशी, महिला सुपरवाइजर, उम्र 35….जिन्हें पकड़ना लोकायुक्त को पड़ा।
लक्ष्मी पंडोले, महिला सुपरवाइजर, उम्र 43….साथी मिलकर रिश्वत का खेल खेलती रहीं।
बिंदू माहौर, महिला सुपरवाइजर, उम्र 52….अनुभव तो है, लेकिन नैतिकता कहीं खो गई।
इस पूरे मामले ने साफ कर दिया कि महिला एवं बाल विकास विभाग की चमक-दमक केवल दिखावा है। पद, शक्ति और नाम….सबकुछ भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है। लोकायुक्त की कार्रवाई ने दरअसल सिस्टम की पोल खोल दी है। लेकिन सवाल वही है….क्या यह सिर्फ ट्रेप ऑपरेशन तक सीमित रह जाएगा या इसी कार्रवाई से विभाग में सचमुच सुधार आएगा?
इस कहानी की सबसे बड़ी मार यह है कि जिन्हें बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए थी, वही अपनी गंदी लालच की आग में खुद झुलस गए। और हम, आम लोग, सिर्फ देखते रह जाते हैं।