क्या कोई ठेकेदार खुद ही अपने घोटालों की जांच कर सकता है?…
दैनिक रेवांचल टाइम्स सिवनी – मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में एक बड़ा भ्रष्टाचार और जांच में मिलीभगत का मामला सामने आया है। बिना कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की अनुमति के कार्यपालन यंत्री प्रेम कुमार कुशमारे की अगुआई में एक जांच दल पंचायतों में घुस गया और सीधे दस्तावेज जब्त कर लिए।
लेकिन मामला यहीं नहीं रुकता। चर्चा है कि कुशमारे खुद ही अवसंरचना मद के करीब ₹1.5 अरब के कार्यों में ठेकेदार हैं! यानी जिसने खुद निर्माण कार्य कराए, वो ही अब उसकी जांच कर रहा है।
भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह – जांच नहीं, पर्देदारी…
राज्य शासन द्वारा मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना और अवसंरचना मद में हुई अनियमितताओं की जांच के लिए गठित जांच दल की अगुआई प्रेम कुमार कुशमारे कर रहे हैं, जो मूल रूप से मंडला में पदस्थ हैं और स्थानीय भाजपा सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते के नजदीकी माने जाते हैं।
सूत्रों के अनुसार, जांच दल ने कलेक्टर शीतला पटले और जिला पंचायत सीईओ को सूचना देना जरूरी नहीं समझा, और सीधे पंचायतों में जाकर दस्तावेज मांगने लगे — जो कि शासन के नियमों का सरासर उल्लंघन है। नियमों के अनुसार जांच से पहले कलेक्टर और सीईओ की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
सांसद-विधायकों की सिफारिश पर “कमीशन का खेल”, पंचायतें बनी शिकार…
प्रदेश में भाजपा के शासनकाल में अवसंरचना मद के अंतर्गत अधिकतर कार्य भाजपा विधायकों और सांसदों की सिफारिश पर स्वीकृत किए जाते हैं।
लखनादौन और केवलारी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस विधायक हैं, इसलिए यहां कार्य भाजपा सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते की सिफारिश पर स्वीकृत हुए, जिनके करीबी ठेकेदारों को ठेका दे दिया गया।
सूत्र बताते हैं कि इन कार्यों में 20% सांसद/विधायक कमीशन, 10% सरपंच-सचिव, 10% विभागीय अधिकारियों और 10% खुद के लिए – यानी कुल 50% राशि केवल बंटवारे में उड़ गई! बाकी आधे पैसों से निर्माण कराए जा रहे हैं — जिसका परिणाम है गुणवत्ता हीन सड़कें, अनुपयोगी घाट, और फर्जी परकुलेशन टैंक।
औचित्यहीन निर्माण: जहां जरूरत नहीं, वहां घाट-सड़कें बन गईं!
जांच में सामने आया कि सिवनी जिले में कई ऐसे तालाबों में घाट बना दिए गए, जो मौजूद ही नहीं हैं!
कुछ गांवों में 10 लाख की लागत के परकुलेशन टैंक में 25 लाख के घाट बना दिए गए।
कई ग्रेवल सड़कें निर्जन इलाकों में, जिनका कोई उपयोग नहीं।
स्पष्ट है कि अवसंरचना मद को जमकर लूटा गया।
जांच पर ही सवाल — खुद ट्रैप हो चुके अधिकारी कर रहे जांच!
जांच दल में शामिल सहायक यंत्री सनिल जैन पूर्व में लोकायुक्त ट्रैप हो चुके हैं।
वहीं कुशमारे खुद जिन कामों के ठेकेदार हैं, अब उन्हीं की जांच कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, जिला स्तर के अन्य सदस्यों की भूमिका नगण्य है, अधिकतर सदस्य मौके पर मौजूद ही नहीं रहते — सिर्फ कुशमारे और जैन ही पंचायतों में घूमते नजर आ रहे हैं।
प्रशासन को अंधेरे में रखकर की जा रही है जांच — नियमों की खुली धज्जियां
जांच नियमों के अनुसार किसी भी जांच दल को जिला प्रशासन को सूचित करना अनिवार्य होता है।
लेकिन प्रेम कुमार कुशमारे की टीम ने सिर्फ उपेन्द्र मिश्रा (कार्यपालन यंत्री) को भरोसे में लेकर पंचायतों में दस्तावेजों की मांग शुरू कर दी।
न तो जिला कलेक्टर को सूचित किया गया, न ही जिला पंचायत के सीईओ को।
अब क्या? — शासन को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए
जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं
क्या खुद के कार्यों की जांच खुद करना स्वीकार्य है?
क्या ट्रैप हो चुका अधिकारी ईमानदारी से जांच कर सकता है?
क्या शासन जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
इस पूरे मामले में अब जिले की संवेदनशील कलेक्टर शीतला पटले से अपेक्षा है कि वे तत्काल संज्ञान लेकर:
1. जांच दल को तुरंत रोके
2. प्रेम कुमार कुशमारे व सनिल जैन को जांच दल से हटाने की अनुशंसा करें।
3. मुख्यालय भोपाल को लिखित में संपूर्ण प्रकरण से अवगत कराएं
निष्पक्ष जांच नहीं, तो भ्रष्टाचार का खुलेआम संरक्षण!
अगर इसी तरह ठेकेदार जांच अधिकारी बन जाएं, तो फिर जांच के नाम पर जनता की आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नहीं होगा।
सरकार को चाहिए कि वह जांच की पुनर्समीक्षा कर निष्पक्ष टीम का गठन करे ताकि करोड़ों की लूट पर पर्दा नहीं, पर्दाफाश हो
ये खबर सिर्फ एक घोटाले की नहीं, शासन व्यवस्था के चरमराने की कहानी है।
अगर अब भी आंखें मूंदी रहीं, तो सिवनी और मंडला जैसे जिलों में लोकतंत्र का गला घोंटा जाता रहेगा – पंचायतें नहीं, नेताओं के ‘पे-हब’ बन जाएं।