भावांतर – सामयिक समीक्षा व निगरानी करनी होगी
गुप्त जी की प्रसिद्ध कविता ‘किसान’ यहाँ प्रासंगिक हैं –
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहां
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहां
आता महाजन के यहां वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं
इस कविता के मर्म को और कृषक की वेदना को समझने वाली भाजपा सरकार इस दौर में उपस्थित है।
किसानों की बात में यहाँ कविता इसलिए भी कि श्रद्धेय अटल जी ने कभी कहा था – जिस देश का शासक कवि हो (कविता को समझता हो) उस देश का नागरिक कभी भूखा नहीं सो सकता।
मध्यप्रदेश में सोयाबीन हेतु ‘भावांतर योजना’ का शुभारंभ हो गया है। यदि मंडी में औसत क्वालिटी की फसल का औसत विक्रय मूल्य एमएसपी से कम हो, तो किसान को एमएसपी और वास्तविक विक्रय मूल्य के बीच का भावांतर दिया जाएगा।
यदि विक्रय मूल्य मॉडल रेट से भी कम हो, तो क्षतिपूर्ति एमएसपी और मॉडल रेट के अंतर के आधार पर दी जाएगी।इस घोषणा के दो पक्ष हैं। एक – मप्र सरकार कृषकों के प्रति संवेदनशील है, सरोकारी है, उनका हित चाहती है। दूजा – यद्यपि मप्र सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी करने की अपनी क्षमताओं का युक्तियुक्त उपयोग नहीं कर पा रही है, तथापि इस दिशा में वह हृदय से प्रयास तो कर ही रही है। किसान हितैषी अपने लक्ष्यों को पूर्ण भी कर रही है मप्र की भाजपा सरकार।
इस संदर्भ में यह आवश्यक होगा कि भावांतर की साप्ताहिक समीक्षा मप्र सरकार करती रहे और कृषक हित को सुरक्षित रखें।
मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार की मंशा पर, नियत पर, किसान हितैषी स्वभाव पर कोई शंका नहीं किंतु भावांतर योजना का इतिहास अच्छा नहीं रहा है। एक पक्ष यह भी है कि इस बार मप्र सरकार ने भावांतर योजना के लीकेजेस समाप्त करने हेतु भरपूर प्रयास किए हैं। इससे यह आशा बनी है कि इस भावांतर योजना का अधिकतम लाभ मप्र के सोयाबीन उत्पादकों को मिलेगा। भावांतर योजना में व्यापारियों का नेक्सस निर्मित न हो जाये यह भी सरकार को जाँचते रहना होगा।
बाजार स्थिति को देखते हुए मप्र के किसानों को केंद्र द्वारा घोषित सोयाबीन का समर्थन मूल्य ₹5328 प्रति क्विंटल, शायद ही मिल पाये।
नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों को अधिकतम 799 रू. प्रति क्विंटल भावांतर देने की योजना बनाई है। भावांतर की कुछ राशि प्रदेश सरकार भी अपनी ओर से जोड़ देती तो अधिक उचित रहता।
मध्यप्रदेश में कुछ वर्षों पूर्व लागू रही भावांतर योजना अन्नदाता किसान को समुचित लाभ दिलाने में असफल रही थी। यह उस समय की कुछ गलत नीतियों के कारण था। उस समय कृषकों को भावांतर की राशि मिलने भी बड़ी देरी हुई थी। खैर, उसके बाद तो नर्मदा जी में पानी बहुत बह गया है। भाजपा सरकार ने अपनी कृषक नीतियों को बहुत संवर्धित व कृषक हितैषी बना लिया है।
इस बार की भावांतर योजना में मप्र सरकार को और अधिक सावधान रहना होगा। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि –
भावांतर की निर्धारित राशि 799/- रू. प्रति क्विंटल संभावित हानि से बहुत कम है।
भावांतर में कुछ राशि मप्र सरकार अपनी ओर से भी समय-परिस्थिति देखकर जोड़ देगी, ऐसा विश्वास मप्र के कृषकों को अपनी भाजपा सरकार पर है।
क्योंकि, मप्र में लागू हुई पिछली बार की भावांतर योजना में भुगतान व्यवस्था चरमरा गई थी।
क्योंकि, भावांतर योजना लागू होते से ही कॉर्पोरेट स्तर के लोग संबंधित कृषि उपज के भावों में गिरावट ले आते हैं। मानसिकता यह बन जाती है कि सरकार तो किसानों को भावांतर दे ही रही है। इस मानसिकता से कृषकों के घर उस संबंधित कृषि उपज से खाली हो जाते हैं और बड़ी कंपनियों के गोदाम भर जाते हैं।
क्योंकि संबंधित कृषि उपज से पाइप लाइन खाली होने से नियंत्रण शक्ति कॉर्पोरेट हाथों में केंद्रित हो जाती है।
क्योंकि इस बार सोया उत्पादन के आंकड़े बहुत कम आए हैं।
क्योंकि, मूल्य नियंत्रण शक्ति कॉर्पोरेट विश्व के हाथों में केंद्रित हो जाती है इसलिए, इससे, प्रदेश के छोटे, मझोले, बड़े व्यापारी और किसान दोनों ही कॉर्पोरेट वर्ल्ड की कठपुतलियाँ बन जाती हैं। कॉर्पोरेट वर्ल्ड की बड़ी राक्षसी कंपनियाँ कृषक और छोटे व्यापारी दोनों को अपने कुचक्र में फँसा लेती है। कंपनियाँ किसान और व्यापारी दोनों के गोदामों से असमय माल बिकवा देती है। इसके बाद उस उपज विशेष के बाजार मूल्य का नियंत्रण शोषक कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो जाता है।
क्योंकि मूल्य नियंत्रण शक्ति कार्पोरेट्स के हाथों में केंद्रित होने से पूरे देश का उपभोक्ता भी शोषित होता है।
क्योंकि भावांतर में तनिक सी भी असावधानी से मप्र का किसान और व्यापारी दोनों ही कष्ट में आ जाते हैं। यदि कोई कमाता है तो वह है बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ।
भावांतर योजना की इन स्थितियों देखते हुए मप्र सरकार
को प्रति सप्ताह भावांतर योजना की ग्राउंडलेवल समीक्षा करनी होगी। मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपने धन-बल से मध्यप्रदेश के किसानों और छोटे मंडी व्यापारियों के हितों पर डाका न डाल पाये यह सुदृढ़ता मप्र की किसान हितैषी मोहन सरकार को स्वयं में लानी ही होगी।
वैसे, राहत यह है कि प्रदेश की भाजपा सरकार कृषकों को हानि न होने देने हेतु दृढ़ संकल्पित दिख रही है।
प्रवीण दाताराम गुगनानी, guni.pra@gmail.com 9425002270