भ्रष्टाचार डायरी भाग- 2….. भ्रष्टाचार की बेशर्मी, जिला प्रशासन में एक जोरदार तमाचा, अंगद की तरह जमे हैं संतोष शुक्ला, जांच बैठी लेकिन जांच नहीं चली

भ्रष्टाचार डायरी भाग- 2

भ्रष्टाचार की बेशर्मी, जिला प्रशासन में एक जोरदार तमाचा, अंगद की तरह जमे हैं संतोष शुक्ला, जांच बैठी लेकिन जांच नहीं चली


रेवांचल टाईम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिले के लिए और शिक्षा विभाग और जाँच एजंसियों के लिए फिर तमाचा साबित सहायक आयुक्त जो कि कलेक्टर की जाँच के आदेश के बाद जाँच टीम तो बनी पर तय सीमा में जाँच पूर्ण नही हुई और पुनः उसी कुर्सी में जाँच पूर्ण ही अपनी राजनीतिक संरक्षण एक बार फिर कुर्सी उसी पर बैठे हैं, वहीं संतोष शुक्ला… और हम सब देखते रह गए। क्या यह एक सिस्टम और जिला प्रशासन पर तमाचा से कम नही है जो झबुआ से मंडला और मंडला से डिंडौरी तक लगातार भ्रष्टाचार ग़बन जैसे अनेको गंभीर आरोप लगते रहे पर वह अपनी कुर्सी पर यथावत बने नजर आ रहे हैं।
घोटालों के शिल्पकार: संतोष शुक्ला की डायरी भाग 2 लगातार

चार महीने पहले जिनके खिलाफ जांच का आदेश जारी हुआ, जिनके भ्रष्टाचार की शिकायतें लोकायुक्त से लेकर प्रदेश के आला अफसरों तक पहुंची, जिनके नाम पर करोड़ों की बंदरबांट के दस्तावेज जिला पंचायत उपाध्यक्ष अंजू ब्यौहार तक ने सौंपे….वही संतोष शुक्ला अब भी सरकारी कुर्सी पर पुनः बैठे हैं, और सिस्टम उनका सिर झुकाकर नहीं, सिर झुकवाकर सलाम कर रहा है।
क्या यही प्रशासन है? क्या यही व्यवस्था है? और क्या यही नियम कानून का सिस्टम है या फिर अब भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए सिस्टम में बैठे जिम्मेदारो ने ही चुप्पी की चादर ओढ़ ली है आख़िर क्यो ? इसकी पीछे की क्या वजह हो सकती हैं।
वही जब एक ईमानदार कलेक्टर नेहा मारव्या ने प्राप्त शिकायत में 11 मार्च 2025 को जांच का आदेश ज़रूर दिया, तीन अफसरों की टीम बना दी गई….पर उस टीम ने अब तक क्या किया? क्या कोई रिपोर्ट सार्वजनिक हुई? क्या किसी स्कूल की हालत सुधरी? क्या किसी हॉस्टल में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई? जवाब है….”नहीं”। जांच वहीं की वहीं… और शुक्ला जी अंगद की तरह वहीं जमे।
छात्रावास, स्कूल मरम्मत, स्मार्ट क्लास, खेल सामग्री, निर्माण कार्य….सरकारी धन का कोई क्षेत्र नहीं बचा, जहां संतोष शुक्ला ने अपनी पकड़ न दिखाई हो।
करंजिया जनपद अध्यक्ष चरण सिंह धुर्वे धरने पर बैठे रहे,
पर सिस्टम बैठा रहा संतोष शुक्ला को कुर्सी पर।
सवाल उठता है …. आखिर इतनी राजनीतिक ताकत शुक्ला को कौन दे रहा है?
लोकायुक्त के छापे के बाद जिस अफसर ने खुद को भूमिगत कर लिया था, आज वही फिर से सफेदपोशों की गोद में बैठकर भ्रष्टाचार के घूंट गटक रहा है। स्कूलों में घटिया खेल सामग्री पहुंचाई जा रही है, मरम्मत कार्यों में घपला है, दीवारें गिर रही हैं, छतें टपक रही हैं….और मासूम आदिवासी बच्चे डर में पढ़ाई कर रहे हैं। ये कौन सी ‘जनजातीय कल्याण नीति’ है, जहां कल्याण की जगह कलंक परोस दिया गया है?
भ्रष्टाचार का चेहरा अब सिस्टम के भीतर नहीं, सिस्टम बन चुका है।
सहायक आयुक्त कार्यालय में पदस्थ एक दैनिक वेतनभोगी, जो खुद को सहायक ग्रेड-2 दर्शाता है….असल में भ्रष्टाचार की चाभी है। वह कंप्यूटर ऑपरेटर नहीं, एक पूरा नेटवर्क है….जिसे संतोष शुक्ला ने अपने रिश्तेदारों और राजनैतिक आकाओं के साथ मिलकर खड़ा किया है।
संतोष शुक्ला का नाम अब केवल एक व्यक्ति का नहीं रहा, यह नाम बन चुका है व्यवस्था की विफलता, राजनीतिक संरक्षण, और प्रशासनिक चुप्पी का।
“अब सवाल यह नहीं कि जांच कब पूरी होगी, सवाल यह है कि क्या जांच होगी भी?”
एक ओर जिला पंचायत उपाध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष, शिक्षा समिति और तमाम शिकायतकर्ता हैं,
दूसरी ओर एक आदमी….संतोष शुक्ला।
और आश्चर्य देखिए, जीत उसी की होती जा रही है।
तो क्या अब डिंडोरी में भ्रष्टाचार भी ‘आरक्षित’ हो गया है?
कभी-कभी सिस्टम इतने गहरे गड्ढे में धँस जाता है कि उसमें से बाहर निकलने के लिए कानून नहीं, हिम्मत चाहिए। लेकिन अफ़सोस… यह हिम्मत, अब शायद कुर्सियों से बाहर निकली ही नहीं जाती।
अतुल कुमार की रिपोर्ट

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