संरक्षण में पलता भ्रष्टाचार” — झाबुआ, मंडला, डिंडौरी के बाद खंडवा में बच्चों और शिक्षकों के हक पर डाका!

ट्राइबल विभाग के अफसर का कारनामा, खातों में ली घूस, रिटायरमेंट के दिन निकाले तबादला आदेश

विभागीय मंत्री विजय शाह के गृह जिले का मामला, प्रभारी मंत्री बोले, निरस्त कराएंगे सभी आदेश

दैनिक रेवांचल टाईम्स – पूरे प्रदेश में यूं तो सरकार ने अधिकारी से लेकर चपरासी तक के तबादले पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद भी जनजातीय विभाग के एक अधिकारी ने रिटायरमेंट के आखिरी दिन 50 तबादला आदेश निकाले। यह कारनामा जनजातीय कार्य विभाग के मंत्री विजय शाह के गृह जिले खंडवा का है। जहां सहायक आयुक्त संतोष शुक्ला ने अपने अधीनस्थ टीचर और हॉस्टल अधीक्षकों को इधर से उधर कर दिया। तबादलों के लिए लेनदेन के भी आरोप लग रहे हैं।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भ्रष्टाचार के महामहिम कहे जाने वाले सहायक आयुक्त संतोष शुक्ला ने 31 मार्च को रिटायर हो गए है। शुक्ला ने 26 मार्च से 31 2026 मार्च बीच बडी जिले में संचालित जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावास और आश्रम में पदस्थ हॉस्टल अधीक्षक सहित शिक्षकों और भृत्यों के ट्रांसफर किए हैं। कई लोगों को प्रमोशन तक दे दिए, जो कि उनके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं हैं। इस मामले में जय आदिवासी युवा संगठन ने मुख्यमंत्री से शिकायत कर जांच की मांग की है। हालांकि खंडवा के प्रभारी मंत्री धर्मेंद्रसिंह लोधी का कहना है कि, किसी भी ट्रांसफर आदेश में उनकी स्वीकृति नहीं ली गई है, ना ही उन्होंने दी हैं। यदि जनजातीय कार्य विभाग में ऐसा हुआ हैं तो उन सारे ट्रांसफर आदेशों को निरस्त कराया जाएगा।
वही प्रदेश में प्रशासनिक भ्रष्टाचार किस हद तक बेलगाम हो चुका है, इसका जीता-जागता उदाहरण सहायक आयुक्त संतोष शुक्ला का मामला बनता जा रहा है। झाबुआ, मंडला, डिंडौरी के बाद अब खंडवा में भी उनके कारनामों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
शिक्षकों से लेकर बच्चों के हक पर सीधा हमला, जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावास और आश्रम, जो आदिवासी बच्चों के भविष्य की नींव माने जाते हैं, वहीं पर भ्रष्टाचार की जड़ें जम चुकी हैं।
आरोप हैं कि—
पोस्टिंग और ट्रांसफर के नाम पर लेनदेन
छात्रावासों में वित्तीय अनियमितताएं
शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह चौपट करना
यानी जिन बच्चों के विकास के लिए योजनाएं बनीं, उन्हीं के हक पर डाका डाला जा रहा है।
शिकायतें, जांच… और फिर “सन्नाटा”
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि—
लगातार शिकायतें होती रहीं
जनसंगठनों ने आवाज उठाई
उच्च स्तर तक मामले पहुंचे
लेकिन आज तक कोई ठोस और अंतिम कार्रवाई नहीं हुई।
पुराना रिकॉर्ड भी सवालों में
साल 2018 में मंडला में संतोष शुक्ला के घर लोकायुक्त की रेड पड़ चुकी है
डिंडौरी में तत्कालीन कलेक्टर द्वारा निलंबन की कार्रवाई भी की गई थी
इसके बावजूद न तो स्थायी जांच हुई, न ही किसी बड़े स्तर पर सख्त कार्रवाई।
संरक्षण का खेल?
सूत्रों की मानें तो—
बड़े नेताओं और प्रभावशाली लोगों का संरक्षण, राजनीतिक दबाव विभागीय ढिलाई, इन्हीं वजहों से हर बार मामला दब जाता है और कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।
सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति पर सवाल
सरकार भले ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश की बात करती हो, लेकिन ऐसे मामलों ने इस दावे पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
क्या यही है “जीरो टॉलरेंस”?
क्या भ्रष्ट अधिकारी ही सिस्टम के चहेते बन गए हैं?
शिक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा असर
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा नुकसान—
आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है
छात्रावासों की स्थिति बिगड़ी
योग्य शिक्षकों की जगह “सेटिंग वाले” लोग यानी भविष्य की पीढ़ी के साथ सीधा खिलवाड़।
अब भी नहीं जागा प्रशासन तो…
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का आईना है।
अब सवाल सीधा है—
क्या सरकार और प्रशासन अपनी “बंद आंखें” खोलेगा?
या फिर यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह दब जाएगा?

वही मंडला जिले में इनके कार्यकाल में लेब जैसे भवन तक ग़ायब हो लाखों की राशि अजगर से निगल लिए जिसका प्रकरण आज भी माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में विचाराधीन है। अगर समय रहते इस पूरे नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भ्रष्टाचार और गहराता जाएगा और सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों का होगा, जिनके लिए ये योजनाएं बनाई गई हैं।

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