मवई के जंगलों पर अवैध कटाई का बड़ा खुलासा, “जिले का कश्मीर” बनता जा रहा बंजर
मवई के वनों वन माफियाओं के चल रहा है राज जिम्मेदार मौन

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले के मवई जहाँ चारों ओर हरियाली प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण पर आज वह बीरान होने की कगार में पहुँच रहा है जहाँ मवई के आस पास ईट भट्टो में वनों की लकड़ी झोंकी जा रही है और जंगल के अंदर के नदी नालों से रेत का अबैध परिवहन जैसे अनेकों कारनामें हो रहे है और मवई का पूरा वन विभाग चैन सो आराम फरमा रहा है जहाँ तेजी से जंगल साफ़ होने की जानकारी प्राप्त हो रही वन माफ़िया पहले हरे भरे पेडों को दवाई के माध्यम से सूखा रहे हैं फिर उसे गिरा कर उस लकड़ी को ईट के भट्टो में धड़ल्ले से स्तमाल किये जा रहे है वही जानकारी के अनुसार ग्राम मवई के आसपास ही आधा सैकड़ा से अधिक भत्ते लागये जा रहे हैं।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वन परिक्षेत्र मवई में इन दिनों अवैध कटाई का गंभीर मामला सामने आ रहा है, जिसने पूरे क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व सामान्य वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम रमतिला, सारसडोली और भड़गा टोला सहित आसपास के वन क्षेत्रों में कीमती साल के विशाल वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटाई की जा रही है। इन वृक्षों को काटकर बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा है, जिससे वन संपदा को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
वही स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन क्षेत्रों में दिन-रात पेड़ों की कटाई जारी है, लेकिन इस पर रोक लगाने के लिए वन विभाग द्वारा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बिना विभागीय मिलीभगत के इतनी बड़े स्तर पर अवैध कटाई संभव नहीं है। ऐसे में वन विभाग की चुप्पी सीधे तौर पर संदेह के घेरे में है और यह किसी बड़े कमीशन या सांठगांठ की ओर इशारा करती है।
मवई क्षेत्र को कभी “जिले का कश्मीर” कहा जाता था। यहां के घने जंगल, शीतल हवाएं, झरने, नदियां और पहाड़ इसकी पहचान हुआ करते थे। यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता से भरपूर था, जहां दूर-दूर से लोग इसकी हरियाली और शांति का आनंद लेने पहुंचते थे। लेकिन आज वही मवई अपनी पहचान खोता नजर आ रहा है। हजारों पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के कारण हरे-भरे जंगल तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं और कई स्थानों पर वन क्षेत्र अब मैदान में तब्दील हो चुके हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी प्रकार वन संपदा का दोहन जारी रहा तो इसका गंभीर असर न केवल स्थानीय पर्यावरण पर पड़ेगा, बल्कि जलवायु संतुलन, वर्षा चक्र और भूजल स्तर पर भी देखने को मिलेगा। इसके साथ ही वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होने से उनका अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है।
इस पूरे मामले में प्रशासन की निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित अभियान की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर वन संपदा की इस तरह खुली लूट चिंता का विषय बन गई है।
अब आवश्यकता है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि मवई के जंगलों को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके।
अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब “जिले का कश्मीर” कहे जाने वाला मवई केवल यादों और इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएगा।