थाना टिकरिया में कथित अवैध वसूली पर सवाल, पुलिस की साख दांव पर आख़िर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है अवैध कारोबार?

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दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।मंडला जिले का थाना टिकरिया/नारायणगंज इन दिनों कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि कथित अवैध वसूली के ‘सिस्टम’ को लेकर चर्चा में है। जुआ-सट्टा, अवैध मुरम उत्खनन, ओवरलोड डंपर, रेत व पत्थर परिवहन, ऑटो संचालन, मवेशी व शराब तस्करी—सूची लंबी है, लेकिन कार्रवाई नदारद।
स्थानीय नागरिकों और विश्वसनीय सूत्रों का आरोप है कि थाना क्षेत्र में चल रहे इन अवैध कारोबारों को कुछ खाकीधारी अभयदान दे रहे हैं। सवाल यह नहीं कि अवैध धंधे चल रहे हैं—सवाल यह है कि वे किसकी शह पर इतने बेखौफ हैं?
कानून नहीं, ‘रसीद सिस्टम’ चल रहा है?
सूत्रों के मुताबिक, थाना टिकरिया में कथित तौर पर एक नियमित वसूली तंत्र सक्रिय है। तय रकम समय पर पहुंची तो वाहन चलता है, धंधा चलता है—और रकम रुकी तो वाहन रोके जाते हैं, धमकियां दी जाती हैं, काम ठप कराया जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अब हालात ऐसे बन गए हैं कि—
“थाने में न्याय नहीं, पहले हिसाब-किताब पूछा जाता है।”
अधीनस्थ ही ‘थाने के मालिक’?
चौंकाने वाली बात यह है कि आरोप सीधे-सीधे कुछ अधीनस्थ कर्मचारियों पर हैं, जो खुद को थाना प्रभारी से कम नहीं समझते। सूत्र बताते हैं कि यही लोग पूरे क्षेत्र की कथित वसूली व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं।
इतनी खुली गतिविधियों के बावजूद यदि कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है—
क्या सब कुछ जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है?
गो-तस्करी और शराब माफिया को खुली छूट?
सूत्रों के अनुसार, कथित संरक्षण का नतीजा यह है कि गो-तस्करी जैसे संगीन अपराध भी बेखौफ होकर अंजाम दिए जा रहे हैं। वहीं, एक आरक्षक पर लंबे समय से शराब तस्करों को मदद पहुंचाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं—सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ है।
सब जानते हैं, फिर चुप्पी क्यों?
हैरानी इस बात की है कि इतनी व्यापक गतिविधियों के बावजूद न तो थाना स्तर पर ठोस कार्रवाई दिखती है और न ही वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कोई सार्वजनिक जवाब।
तो सवाल उठता है—
क्या थाना टिकरिया किसी अदृश्य शक्ति के संरक्षण में है?
क्या वर्दी का डर अब सिर्फ आम जनता के लिए बचा है?
और क्या ‘ख़ाकी’ का मतलब अब सेवा नहीं, सुविधा बनता जा रहा है?
जनता की नजरें अब ऊपर तक
इस पूरे मामले पर अब तक पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। स्थानीय जनता की निगाहें अब नए थाना प्रभारी, पुलिस अधीक्षक और जिले के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं।
लोगों की सीधी मांग है—
निष्पक्ष, उच्चस्तरीय जांच हो, दोषियों की पहचान सार्वजनिक की जाए और यदि आरोप सही हैं तो वर्दी में बैठे भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब किया जाए।
क्योंकि अगर कानून के रखवाले ही सौदेबाज़ बन जाएं,
तो फिर आम आदमी इंसाफ की उम्मीद किससे करे?

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