लेखनी का धर्म और होली का मर्म

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​न कोई छोटा, न कोई बड़ा है,

हर हाथ में थमा कलम एक मशाल है।

अखबार के पन्नों पर जो अंकित हो,

वही पत्रकारिता की असली ढाल है।

​प्रतिस्पर्धा हो श्रेष्ठता की, न कि द्वेष की,

गिराकर किसी को, ऊँचा उठा नहीं जाता।

दौड़ना है तो खुद की रफ़्तार बढ़ाओ,

टाँग खींचकर कोई शिखर तक नहीं पहुँचा पाता।

​चौथा स्तंभ खड़ा है सत्य की नींव पर,

एकता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

निष्पक्ष भाव से जो समाज को दिशा दे,

वही इस पेशे की सच्ची भक्ति है।

​होली की पावन अग्नि प्रज्वलित है आज,

चलो इसमें अपने ‘अहं’ की आहुति दे दें।

दूसरों को नीचा दिखाने वाली सोच को,

होलिका की लपटों में ही राख होने दें।

​रंगों के इस उत्सव में संकल्प एक लें,

लेखनी से हम सच का मान बढ़ाएंगे।

त्याग कर द्वेष, थाम कर एक-दूजे का हाथ,

हम सब मिलकर लोकतंत्र को और सशक्त बनाएंगे।

​”कलम की स्याही में जब ईमानदारी का रंग मिलता है, तभी समाज के चेहरे पर असली मुस्कान आती है।”

 

*जितेन्द्र अलबेला (पत्रकार )*

*अध्यक्ष*

*जबलपुर संभाग*

*भारतीय पत्रकार संघ (AIJ)*

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