आजीविका मिशन से समूहों की खुली बगावत

जबरन पंजीयन का आरोप, मिशन बंद करने की उठी तेज मांग

 

रेवाँचल टाईम्स – मंडला, मध्य प्रदेश के मंडला जिले में आजीविका मिशन के खिलाफ स्व सहायता समूहों में भारी असंतोष और आक्रोश देखने को मिल रहा है। कई स्व सहायता समूह आजीविका मिशन से जुड़ने से साफ इनकार कर रहे हैं, इसके बावजूद मिशन से जुड़े कुछ लोगों द्वारा जबरदस्ती पंजीयन कराने का दबाव बनाए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। इसे लेकर जिलेभर में नाराजगी पनपती जा रही है।
गौरतलब है कि पूर्व में मंडला जिले में तेजस्विनी परियोजना संचालित की गई थी, जिससे भी कई समूहों ने दूरी बनाई थी और अंततः वह परियोजना बंद हो गई। अब उसी तरह आजीविका मिशन पर भी सवाल उठने लगे हैं। समूहों का स्पष्ट कहना है कि वे स्वतंत्र रूप से अपने समूहों का संचालन करना चाहते हैं, किसी बाहरी नियंत्रण या दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।
सूत्रों के अनुसार, आजीविका मिशन के द्वारा पहले से गठित समूहों को चिन्हित कर जबरन पंजीयन कराने का खेल चल रहा है, क्योंकि पुराने समूहों का पंजीयन कराना आसान होता है। जानकारों की मानें तो इस प्रक्रिया में कुछ लोगों को प्रति पंजीयन आर्थिक लाभ (एवरेज में पैसा) भी मिलता है, इसी लालच में यह दबाव बनाया जा रहा है।
इस मामले में नैनपुर तहसील के ग्राम चिचोली निवासी एक महिला का नाम सामने आया है, जो गांव-गांव जाकर पहले से गठित समूहों की महिलाओं को भड़काने और डराने का काम कर रही है। आरोप है कि वह गलत और भ्रामक बातें फैलाकर जबरदस्ती समूहों का पंजीयन कराने में जुटी हुई है। यदि समय रहते इस महिला को नियंत्रित नहीं किया गया, तो मामले की शिकायत उच्च स्तर तक किए जाने की चेतावनी भी दी गई है।
समूहों का साफ सवाल है कि जो जुड़ना नहीं चाहते, उन्हें आखिर क्यों मजबूर किया जा रहा है? आजीविका मिशन का उद्देश्य सशक्तिकरण था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह मिशन अब कर्ज लेने और दिलाने का अड्डा बन गया है, जिससे कई समूह कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं।
आक्रोशित समूहों और ग्रामीणों की मांग है कि
जबरदस्ती पंजीयन की प्रक्रिया तत्काल बंद की जाए
केवल स्वेच्छा से जुड़ने वाले समूहों का ही पंजीयन हो

आजीविका मिशन के कार्यों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
जनभावना इतनी प्रबल हो चुकी है कि अधिकांश लोगों ने आजीविका मिशन को ही बंद करने की मांग शुरू कर दी है। लोगों का कहना है कि समूहों को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए, न कि दबाव, डर और कर्ज के जरिए उन्हें जकड़ा जाए। यदि समय रहते प्रशासन ने संज्ञान नहीं लिया, तो यह विरोध और भी उग्र रूप ले सकता है।

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