रेल व्यवस्था पूरी तरह चोपट, समय पर नहीं पहुँच रहीं ट्रेनें — यात्रियों की जिंदगी पटरी से उतरी

घंटों की देरी, कोई सूचना नहीं, न जवाबदेही; रेलवे प्रशासन की लापरवाही से यात्री बेहाल
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले में रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन वर्तमान हालात में यह जीवनरेखा खुद हांफती नजर आ रही है। जिले से होकर गुजरने वाली अधिकांश यात्री और एक्सप्रेस ट्रेनें अपने निर्धारित समय पर स्टेशन नहीं पहुँच रही हैं। कहीं एक-दो घंटे तो कहीं चार-पांच घंटे तक की देरी अब आम बात हो चुकी है, जिससे यात्रियों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है।
स्टेशन पर बैठे यात्रियों को न तो सही सूचना मिलती है और न ही किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय होती है। ट्रेन लेट होने का कारण पूछने पर रेलवे स्टाफ के पास भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता। सूचना तंत्र पूरी तरह फेल नजर आ रहा है।
कामकाजी लोग, छात्र, बुजुर्ग, महिलाएं और मरीज सबसे ज्यादा परेशान हैं। कई यात्रियों की आगे की बसें और ट्रेनें छूट जा रही हैं, तो कई को मजबूरी में होटल या स्टेशन पर रात गुजारनी पड़ रही है। शादी-विवाह, परीक्षा, नौकरी और इलाज जैसे जरूरी कामों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि रेलवे द्वारा किसी भी प्रकार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा रही। न समय पर घोषणा, न डिजिटल बोर्ड पर सही अपडेट और न ही देरी के लिए कोई आधिकारिक सूचना। यात्रियों को सिर्फ इंतजार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
रेलवे अधिकारी अक्सर तकनीकी कारण, ट्रैक मेंटेनेंस या परिचालन समस्या का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर समस्याएं पहले से ज्ञात हैं तो समय-सारणी में सुधार क्यों नहीं किया जा रहा? क्या रेलवे यात्रियों के समय और सुविधा की कोई कीमत नहीं मानता?
स्थानीय यात्रियों का कहना है कि यह स्थिति नई नहीं है, बल्कि महीनों से लगातार बनी हुई है। इसके बावजूद न तो रेल प्रशासन ने कोई स्थायी समाधान किया और न ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई।
निष्कर्ष (सीधा सवाल रेल प्रशासन से):
रेल व्यवस्था का इस तरह से चरमराना केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि यात्रियों के अधिकारों का खुला उल्लंघन है। समय पर ट्रेन न चलना, सही सूचना न देना और यात्रियों को असहाय छोड़ देना — यह सब रेलवे प्रशासन की घोर लापरवाही को दर्शाता है। यदि जल्द ही समय-सारणी सुधार, पारदर्शी सूचना व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह जनआक्रोश बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। अब देखना यह है कि रेलवे प्रशासन जागता है या फिर यात्रियों की परेशानी को यूँ ही पटरी से उतरने देता है।