जनसुनवाई: सरकारी दिखावा का काला चेहरा!
मंडला में जनता का उमड़ता सैलाब, लेकिन समाधान की जगह सिर्फ झूठे वादे और लापरवाही का जाल
देनिक रेवाँचल टाईम्स – मंडला । राज्य सरकार की तथाकथित महत्वाकांक्षी ‘जनसुनवाई’ योजना अब एक क्रूर मजाक बन चुकी है, जहां हर मंगलवार जिला मुख्यालय पर सैकड़ों गरीब-गुरबों की भीड़ अपनी दुखती रगों को सहलाने पहुंचती है, लेकिन बदले में मिलता है सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाने का आश्वासन।
आदिवासी बहुल मंडला जिले में यह कार्यक्रम अब जनता की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है – आवेदन जमा होते हैं, कलेक्टर निर्देश देते हैं, अधिकारी ‘जल्दी’ का राग अलापते हैं, लेकिन हकीकत में निराकरण शून्य! योजनाओं की पोल खुल रही है, लापरवाही चरम पर है, लेकिन कार्रवाई का नामोनिशान नहीं। क्या शासन-प्रशासन सोया हुआ है, या जानबूझकर जनता को ठग रहा है?
वही जानकारी के अनुसार ग्राम परसवाड़ा तहसील नैनपुर से मनोज सिंह कुशवाह और नयन पडवार जैसे सैकड़ों पीड़ितों की कहानी दिल दहला देने वाली है। मनोज ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ मांगा – दो साल पहले सारे कागजात जमा किए, लेकिन तहसील कार्यालय की लापरवाही ने उन्हें वंचित रखा। “हमारी मेहनत की कमाई छीन ली जा रही है, लेकिन सुनवाई कौन करेगा?” – मनोज का सवाल सीधे सरकार की नाकामी पर तमाचा है। इसी तरह, नयन पडवार ने ग्राम परसवाड़ा में नल जल योजना शुरू करने की गुहार लगाई, लेकिन महीनों बीत गए, पानी की एक बूंद नहीं टपकी। क्या ये योजनाएं सिर्फ चुनावी जुमलों के लिए बनी हैं?
और यह सिर्फ दो उदाहरण नहीं – जनसुनवाई में पानी, बिजली, सड़क, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी शिकायतों का अंबार लगा है। हाल ही में, नैनपुर तहसील के पटवारी हल्का नंबर 34 के किसानों ने पांचवीं बार आवेदन दिया, जहां कॉलोनाइजरों ने खेतों का पहुंच मार्ग अवरुद्ध कर दिया। कलेक्टर सोमेश मिश्रा ने ‘त्वरित निराकरण’ का वादा किया, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं हुआ। इसी तरह, नारायणगंज के पडरिया ग्राम पंचायत में आरक्षित शासकीय भूमि पर अवैध दुकान निर्माण ने ग्रामीणों को सड़क पर उतार दिया – वे जन आंदोलन की धमकी दे रहे हैं, क्योंकि बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा खतरे में है।मंडला जिले के नागरिक भौतिक सत्यापन की मांग कर रहे हैं लेकिन लापरवाही ऐसी कि आवेदन धूल फांकते रहते हैं। ग्रामीणों का गुस्सा फूट रहा है – “अगर योजनाएं सही से लागू होतीं, तो जनसुनवाई में भटकने की क्या जरूरत?” एक स्थानीय निवासी ने कहा, “यह सिर्फ फोटो सेशन और बैनरबाजी है, जनता की पीड़ा का मजाक उड़ाया जा रहा है।”
मंडला की जनता अब इंतजार की हद पार कर चुकी है। ग्राम पंचायतों में सड़कें टूटीं, नालियां बह रही हैं, पेयजल की पाइपलाइनें फूटीं – और अन्य समस्याएं नागरिकों को परेशान कर रही है। क्या सरकार इंतजार कर रही है कि गुस्सा सड़कों पर उतरे? नागरिकों की मांग साफ है: उच्च स्तरीय जांच हो, लंबित आवेदनों का भौतिक सत्यापन कराया जाए, और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो। वरना, यह ‘जनसुनवाई’ सिर्फ एक और सरकारी फेलियर का नाम बनकर रह जाएगी। समय है ठोस कदम उठाने का – जनता की आवाज दबाई नहीं जा सकती!