फिर विवादों के घेरे में रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज..
मंडला के रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज में परीक्षा शुल्क के नाम पर अवैध वसूली का आरोप..

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/मंडला जिले के महाराजपुर स्थित रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज का विवादों से पुराना नाता हैं कॉलेज प्रबंधन के द्वारा बच्चों से फीस के नाम पर तय राशि से अधिक रुपए की मांग करना या फिर एडमिशन के पहले कुछ और बातें तो फिर बाद में अध्यनरत बच्चों को तरह तरह से परेशान कर फीस वसूली के नाम पर अधिक राशि की डिमांड करना। इसी विषय को लेकर जब दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला ने स्टिंग किया तो इसमें बड़ा खुलासा सामने आया स्टिंग में सामने आई चौंकाने वाली बातें…
मंडला जिले के रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज में छात्राओं से निर्धारित सीमा से अधिक फीस वसूले जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस पूरे मामले का खुलासा उस समय हुआ जब रेवांचल टाइम्स मंडला ने इस विषय पर स्टिंग ऑपरेशन किया।
स्टिंग के दौरान कॉलेज प्रबंधन की सीईओ आशिमा पटेल का एक कथित बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि कॉलेज में अध्ययनरत छात्राओं से तय फीस से अधिक राशि ली जाती है। बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि “सिस्टम ही ऐसा है, इसमें बुराई क्या है।”
सूत्रों का कहना हे कि जब उनसे इस अतिरिक्त वसूली पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि “जिसे जहां शिकायत करनी है कर ले, हमारा कुछ नहीं होने वाला।”
इस बयान के सामने आने के बाद शिक्षा व्यवस्था और निजी संस्थानों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में शिक्षा के नाम पर इस तरह की मनमानी गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन रही है।
अब सबकी नजर जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर टिकी है कि इस मामले में क्या कदम उठाए जाते हैं।
*“ज्ञान का मंदिर या वसूली का काउंटर?”*
मंडला के रावतपुरा नर्सिंग कॉलेज से एक नया “प्रबंधन सिद्धांत” सामने आया है —
“सिस्टम ऐसा है… लूट सको तो लूट लो।”
कभी कहा जाता था कि शिक्षा मंदिर है, जहां ज्ञान का दीप जलता है।
लेकिन अब लगता है कि कुछ जगहों पर यह मंदिर एटीएम मशीन बन गया है — फर्क बस इतना है कि यहां कार्ड नहीं, छात्रों का भविष्य स्वाइप होता है।
जब पत्रकार ने पूछा कि तय फीस से ज्यादा पैसे क्यों लिए जा रहे हैं, तो जवाब मिला —
“सिस्टम ही ऐसा है…”
वाह!
यानी अब ईमानदारी नहीं, बल्कि सिस्टम का हवाला सबसे बड़ा कवच बन गया है।
और जब शिकायत की बात आई तो जवाब भी कम दिलचस्प नहीं था —
“जहां शिकायत करनी है कर लो…”
लगता है जैसे यह कोई कॉलेज नहीं, बल्कि “चैलेंज सेंटर” हो —
जहां प्रबंधन खुलकर कह रहा है कि अगर हिम्मत है तो शिकायत करके देख लो।
सबसे दुखद पहलू यह है कि यह सब उस जिले में हो रहा है जिसे आदिवासी बहुल और पिछड़ा इलाका कहा जाता है।
जहां के कई परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन तक गिरवी रख देते हैं।
लेकिन कुछ लोगों के लिए शायद शिक्षा नहीं, बल्कि “कमाई का सुनहरा अवसर” ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अब सवाल यह नहीं है कि फीस ज्यादा ली जा रही है या नहीं।
सवाल यह है कि क्या सच में सिस्टम इतना कमजोर हो चुका है कि कोई खुलेआम कह सके — “लूट लो, कुछ नहीं होगा”?
अगर ऐसा है, तो फिर यह सिर्फ एक कॉलेज की कहानी नहीं,
बल्कि पूरे सिस्टम के आईने की तस्वीर है।