दिन में जलती स्ट्रीट लाइटें सरकारी लापरवाही से उड़ रही बिजली, जिम्मेदार कौन
रेवांचल टाइम्स मंडला शहर में एक ओर आम जनता को बिजली बचाने के लिए जागरूक किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही इस अभियान का मजाक उड़ाती नजर आ रही है। हालात इतने बदतर हैं कि दिन के उजाले में भी स्ट्रीट लाइटें धड़ल्ले से जल रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी आंखें मूंदे बैठे हैं। सवाल यह है कि आखिर इस बर्बादी की जिम्मेदारी कौन लेगा ताजा उदाहरण
भीड़भाड़ वाले क्षेत्र नर्मदा तट किनारे पुल के पास का दृश्य किसी भी जागरूक नागरिक को हैरान कर सकता है। यहां लगे ऊंचे खंभों पर स्थापित हाई मास्क लाइटें दिन के उजाले में जलती दिखाई दे रही है । इन लाइटों की संख्या भी कम नहीं—दर्जनों की तादाद में लगी ये लाइटें सूरज की रोशनी के बावजूद चालू हैं, मानो बिजली मुफ्त में मिल रही हो। यह न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के पैसे का खुला दुरुपयोग भी है।
नगर पालिका द्वारा स्ट्रीट लाइटों के संचालन के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। उनकी जिम्मेदारी तय होती है कि कब लाइटें चालू करनी हैं और कब बंद। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल हैं या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। छुट्टी के दिन तो स्थिति और भी खराब हो जाती है, जब कोई देखने वाला ही नहीं होता और लाइटें पूरे दिन जलती रहती हैं।
स्थानीय लोगों में इसको लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि जब आम आदमी बिजली बिल के बोझ तले दबा हुआ है और हर यूनिट बचाने की कोशिश कर रहा है, तब सरकारी विभागों का यह रवैया अस्वीकार्य है। लोगों का यह भी आरोप है कि कई सरकारी कार्यालयों में खाली कमरों में भी पंखे और लाइटें बेवजह चलते रहते हैं। यह लापरवाही केवल अनदेखी नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर विफलता को दर्शाती है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई सरकारी संस्थान समय पर बिजली बिल का भुगतान तक नहीं करते। महीनों तक बिल लंबित रहते हैं, जिससे बकाया राशि बढ़ती जाती है। अंततः इसका भार भी आम जनता पर ही पड़ता है, क्योंकि यह पैसा सरकारी खजाने से ही चुकाया जाता है। यानी जनता से वसूले गए टैक्स का इस्तेमाल इस तरह की लापरवाही की भरपाई में हो रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिकता से जुड़ी हुई है। जब तक जिम्मेदार लोगों को यह एहसास नहीं होगा कि बिजली भी एक सीमित संसाधन है और इसका दुरुपयोग सीधे-सीधे आर्थिक नुकसान है, तब तक स्थिति में सुधार की उम्मीद कम ही है।
इस पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। क्या अधिकारियों को इस स्थिति की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है यदि जानकारी है, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या जिम्मेदार कर्मचारियों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
स्थिति को सुधारने के लिए अब कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, दोषी कर्मचारियों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, तकनीकी समाधान जैसे ऑटोमैटिक टाइमर और सेंसर आधारित सिस्टम को लागू किया जाना चाहिए, जिससे लाइटें स्वतः नियंत्रित हो सकें।
यदि समय रहते इस लापरवाही पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है। बिजली की बर्बादी न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि यह पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। ऐसे में जरूरी है कि प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझे और तुरंत प्रभावी कदम उठाए।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कब तक जागता है, या फिर यूं ही दिन के उजाले में बिजली जलती रहेगी और जिम्मेदार लोग मौन साधे रहेंगे।