बदइंतजामी से बेहाल मध्यप्रदेश के बिजली उपभोक्ता

 

दैनिक रेवाँचल टाईम्स – तेईस साल पहले ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ के कर्ज के साथ मिले सलाह-नुमा-निर्देशों को मैदान में उतारने की खातिर ‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ को तीन तरह की कंपनियों में इसलिए विभाजित किया गया था, ताकि इससे मंडल का घाटा कम या समाप्त हो जाएगा। आज सवा दो दशक बाद देखें तो पता चलता है कि उस जमाने का 2100 करोड़ रुपयों का घाटा अब कई गुना बढ़कर करीब 50,000 करोड़ रुपयों तक पहुंच गया है।मध्यप्रदेश में कुप्रबंधन और अधिकारियों की लापरवाही के कारण बिजली कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई आम उपभोक्ताओं से की जा रही है। बिजली के दाम साल में एक बार तय होते हैं, परंतु असामान्य परिस्थितियों में बिजली उत्पादन सामान्य बनाए रखने के लिए ‘फ्यूल कास्ट एडजस्टमेंट’ (एफसीए) का प्रावधान किया गया है। बिजली कंपनियां इसी प्रावधान का फायदा उठाती हैं और हर 3 महीने में बिजली की कीमत बढ़ा देती हैं।

मध्यप्रदेश में एक अप्रैल से बिजली की नई दरें लागू हो चुकी हैं, जिसमें 4.8 प्रतिशत की वृद्धि का प्रावधान किया गया है। वृद्धि का मुख्य आधार ‘विद्युत वितरण कंपनियों’ (डिस्कॉम) द्वारा पेश किया गया 6044 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा है। इस वृद्धि का उद्देश्य बिजली खरीद की लागत, परिचालन व्यय को पूरा करना और बढ़ते हुए नुकसान को कम करना है, जिसे ‘मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग’ ने मंजूरी दी है। हालांकि कंपनियों ने 10.19 प्रतिशत से अधिक की मांग की थी, लेकिन आयोग ने 4.8 प्रतिशत की वृद्धि को ही मंजूरी दी है। इससे 1.90 करोड़ मध्यम वर्ग और अधिक खपत वाले उपभोक्ताओं को ज्यादा भार महसूस होगा।

यह स्थिति न केवल आर्थिक असमानता बढ़ाती है, बल्कि ऊर्जा न्याय के सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। भारत सरकार द्वारा कोयले पर सरचार्ज की समाप्ति, ‘जीएसटी’ दर का युक्तिकरण और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा थर्मल पावर प्लांट में लगने वाली प्रदूषण नियंत्रक ‘फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन’ (एफजीडी) तकनीक की अनिवार्यता को खत्म करने के बावजूद बिजली दर कम होने की बजाय बढ़ा दी गई। ‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ के पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेन्द्र अग्रवाल ने आयोग से लिखित मांग की थी कि बिजली खरीदी प्रस्ताव व संबंधित पूंजीगत लागत की गहन समीक्षा के बाद ही प्रस्ताव को मंजूरी दी जाए।

मध्यप्रदेश में बिजली की उपलब्धता और खरीदी लंबे समय से विवादों के केंद्र में रही है। जनवरी 2026 के अंत में मध्यप्रदेश सरकार ने निजी कंपनियों के साथ 4,000 मेगावाट बिजली उत्पादन और खरीदी के लिए एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किया है। कंपनियों ने बिजली की दर 5.83 रुपए प्रति यूनिट तय की है। जानकार बताते हैं कि समझौते के कारण मध्यप्रदेश विद्युत कम्पनियों को 25 साल में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का अतिरिक्त भुगतान करना होगा, जिसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर होगा।

बिजली खरीदी और निजी कंपनियों से हुए महंगे समझौतों के कारण उपभोक्ताओं की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। ‘अखिल भारतीय पावर इंजीनियर्स फेडरेशन’ के प्रवक्ता वीके गुप्ता का कहना है कि मध्यप्रदेश में औसत बिजली मांग 9000 मेगावाट और अधिकतम मांग 14,500 मेगावाट है, जबकि राज्य ने पहले ही 21,000 मेगावाट के बिजली खरीद करार पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। राजेन्द्र अग्रवाल का कहना है कि राज्य के पास अगले 10 वर्षों के लिए अतिरिक्त बिजली मौजूद है, ऐसे में अनावश्यक समझौते की जरूरत ही नहीं थी।

बिजली दरों में बढ़ोतरी और ‘डिस्कॉम’ पर बढ़ते वित्तीय दबाव ने राज्य में ऊर्जा प्रबंधन को नई बहस के केंद्र में ला दिया है। ऊंचे दामों पर की जा रही बिजली खरीदी से न सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ा है, बल्कि उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी प्रभावित हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से बिजली दरों में लगातार बढ़ोतरी और बिलों में अनियमितताएं आम उपभोक्ताओं, किसानों और छोटे व्यवसायियों के लिए बड़ी समस्या बन चुकी हैं। राज्य की बिजली खरीद नीतियों, निजी कंपनियों से महंगे समझौतों और ‘डिस्कॉम’ की अक्षमताओं – जैसे लाइनलॉस, बिजली चोरी, प्रबंधन की कमियां और पुराना घाटा – का बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है।

मध्यप्रदेश में बिजली उत्पादन और खरीदी का काम तीन मुख्य स्तरों पर होता है – ‘मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी’ (जो बिजली खरीद की नोडल एजेंसी है), निजी बिजली कंपनियां और राज्य की सरकारी उत्पादन कंपनियां। ‘कैग’ की विभिन्न रिपोर्टों में ‘पावर मैनेजमेंट कंपनी’ की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं, जैसे महंगी दरों पर निजी कंपनियों से बिजली खरीद के अनुबंध। कुछ निजी पावर प्लांट्स से बिजली बाजार दर से अधिक कीमत पर खरीदी गई। अनुबंध के कई प्रावधानों के कारण राज्य को बिना बिजली लिए भी भुगतान करना पड़ता है। एक जानकारी के अनुसार 2020 से 2022 के बीच मध्यप्रदेश सरकार ने निजी कंपनियों को 1,773 करोड़ रुपए का भुगतान किया, जबकि उनसे एक यूनिट भी बिजली नहीं खरीदी गई।

कुछ अनुबंधों में ‘पास-थ्रू’ का प्रावधान है, जिससे बढ़ी हुई ईंधन लागत का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया। कैप्टिव प्राइवेट प्लांटों से भी बाजार कीमत से अधिक दरों पर बिजली खरीदी गई। जहां बाजार दर 2 से 3 रुपए प्रति यूनिट थी, वहीं 4.50 से 6 रुपए प्रति यूनिट तक भुगतान किया गया। राज्य की अपनी उत्पादन कंपनियों के पास पर्याप्त क्षमता होने के बावजूद निजी प्लांटों से अधिक बिजली खरीदी गई। ऊर्जा अर्थशास्त्रियों के अनुसार ये समझौते 2010 से 2015 के बीच हुए थे, जब कोयले की कीमतें अधिक थीं।

आज बिजली का बाजार सस्ता हो चुका है, लेकिन पुराने अनुबंध राज्य को महंगी बिजली खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं। नियामक निगरानी भी पर्याप्त मजबूत नहीं मानी जाती। मूल्य निर्धारण और खरीद फैसलों में अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 200 यूनिट मासिक खपत पर मध्यप्रदेश में लगभग 1,425 रुपए बिल आता है, जबकि छत्तीसगढ़ में 900 रुपए और गुजरात में 785 रुपए है। वहीं 300 यूनिट पर मध्यप्रदेश में 2,342 रुपए, छत्तीसगढ़ में 1,450 और गुजरात में 1,253 रुपए है। कई घरों में औसत घरेलू बिल 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जिससे मासिक बजट पर गहरा असर पड़ा है।

विडंबना है कि ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ (एडीबी) की सिफारिश (टाटा राव कमिटी) पर 2003 में विद्युत मंडल के घाटे को कम करने के लिए बिजली कंपनियों का गठन किया गया था। वर्ष 2000 में घाटा 2100 करोड़ रुपए था, लेकिन 31 मार्च 2025 तक यह बढ़कर 49,239 करोड़ रुपए और 71,394 करोड़ रुपए हो गया है। ऊर्जा किसी भी राज्य की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का आधार होती है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां कृषि, उद्योग और घरेलू उपभोग बड़े पैमाने पर बिजली पर निर्भर हैं, वहां बिजली दरों में वृद्धि का व्यापक प्रभाव पड़ता है। मध्यप्रदेश में मंहगी बिजली का मुख्य कारण उत्पादन और वितरण में पारदर्शिता की कमी, कमजोर निगरानी और जनपक्षीय नीति का अभाव है। वास्तव में सरकार ने ऊर्जा के उत्पादन और वितरण की नीतियों में आम जनता के हितों को प्राथमिकता नहीं दी है।

राजकुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित संघ एवं प्रभावित संघ।

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