बीएलओ का बोझ – अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की जान पर बन आई!

रेवांचल टाईम्स – मण्डला, मंडला जिले से एक चौंकाने वाली और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है जहां बीएलओ के अतिरिक्त भार से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की जान जोखिम में पड़ गई है। जमुना रघुवंशी बिनैका परियोजना की एक समर्पित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बीएलओ ट्रेनिंग के दौरान घायल हो गईं। पैर में गंभीर फ्रैक्चर हुआ और इलाज की जरूरत पड़ी, लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब तक किसी भी विभाग ने न तो सुध ली और न ही एक रुपये की सहायता प्रदान की गई। सवाल उठता है कि क्या हम मानते हैं कि बीएलओ की ड्यूटी निभाना, एक महिला कार्यकर्ता की जिंदगी से बड़ा है? महिला एवं बाल विकास संचालनालय, भोपाल ने पहले ही दिनांक 8 अक्टूबर 2024 को यह स्पष्ट कर दिया था कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बीएलओ या अन्य गैर-संबंधित कार्यों में नहीं लगाया जाए। पत्र क्रमांक /माबावि/आईसीडीएस/एसएपी-2/2024 इसका स्पष्ट प्रमाण है। फिर क्यों जमीनी स्तर पर इस आदेश को अनदेखा किया जा रहा है? क्यों आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अब भी मतदान सूची, सर्वेक्षण, और प्रशासनिक दबावों के बीच पिसती जा रही हैं? वहीं भारतीय मजदूर संघ ने भी जिला निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी मंडला-107,निवास -106, बिछिया 105 के नाम ज्ञापन सौंपा है। जिसकी प्रतिलिपि आयुक्त संचालनालय, महिला एवं बाल विकास मप्र शासन भोपाल एवं जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास मण्डला को प्रेषित किया गया है।
मानसेवी कार्यकर्ता… लेकिन शोषण अनवरत!
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ना केवल बच्चों की देखरेख करती हैं, बल्कि महिलाओं और गर्भवती माताओं के पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी जिम्मेदारियां भी निभाती हैं।इसके बावजूद उन्हें बीएलओ जैसे अतिरिक्त प्रशासनिक कामों में झोंक दिया जाता है बिना किसी अतिरिक्त मानदेय, बिना सुरक्षा, और बिना बीमा! जमुना रघुवंशी की हालत इसका जीता-जागता सबूत है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मांगें
1. संचालनालय के निर्देश का तत्काल पालन हो – सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बीएलओ के कार्य से तत्काल प्रभाव से मुक्त किया जाए।
2. जमुना रघुवंशी को शासन द्वारा इलाज हेतु पूर्ण आर्थिक सहायता मिले।
3. उन्हें स्वस्थ होने तक अवकाश दिया जाए, और उस दौरान पूर्ण मानदेय (मानदेय + अतिरिक्त भत्ता) प्रदान किया जाए।
4. भविष्य में किसी भी मानसेवी कार्यकर्ता को गैर-संबंधित कार्यों में नहीं लगाया जाए।
जिम्मेदार दें ध्यान और समझे पीड़ा
वही कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर अब भी शासन नहीं जागा, तो ये चुप्पी कल किसी और आंगनबाड़ी दीदी की जान ले सकती है। यह केवल एक पैर का फैक्चर नहीं, व्यवस्था का चरम पतन है जहां संवेदनशील सेवाओं से जुड़ी महिलाएं, केवल आंकड़ों में गिनी जाती हैं, इंसान समझी ही नहीं जातीं। यह आवाज सिर्फ जमुना रघुवंशी की नहीं है यह हर उस आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की है जो शासन की अनदेखी के बीच हर दिन जान जोखिम में डाल रही है।