ये कैसा स्कूल चलो अभियान जहाँ छत टपक रही बैठने के नही है फट्टी फर्श में भरा हुआ है पानी

रेवांचल टाईम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिले की शिक्षा व्यवस्था क्या है और क्या चल रही ये आज किसी से छुपी नही है आज जिले में अनेकों शाला भवन ऐसे है जिनमे छत तो पर कब गिर जाए ये कहा नही जा सकता और ये सब भगवान भरोसे से नव निहाल बच्चों का भविष्य बन रहा है और इसकी चिंता जिला मुख्यालय में बैठे शिक्षा विभाग के न सहायक आयुक्त को है और न ही जिला शिक्षा अधिकारी को और जिसकी जिम्मेदारी है वह कोमे में पड़ा हुआ जिला शिक्षा अभियान जिनके पास सहायक यंत्री उपयंत्री टेक्नीशियन जिन्हें ये जिम्मेदारी सौपी गई है और इन अधिकारी कर्मचारी की जिम्मेवारी है और इन्हें देखना भी की कौन कौन से स्कूल में कितना काम है और क्या आवश्कता है शाला भवन दूरस्थ करने के लिए शासन से समय समय से नव निर्माण के साथ साथ मरम्मत कार्य के लिए भी प्रति वर्ष करोडो रुपये दे रही हैं पर इनकी लापरवाही जिले जग ज़ाहिर हो चली है और आज जिले में संचालित सरकारी स्कूल भवनों की जो दुर्दशा बनी है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तिंदनी के पोषक ग्राम बीजाडांडी वन ग्राम की प्राथमिक उन्नयन शाला की स्थित जर्जर है जब मुख्यालय के आसपास के स्कूलों के भवन की स्थिति जर्जर है तो जिले के दूरस्थ स्कूलों के हालात होगे ये अनुमान आसानी से लगाया जा सकता हैं, जहाँ बिल्डिंग तो है वह मात्र दिखावे के लिए बिल्डिंग में जगह जगह तिडकन दरारे आ गई है और प्लास्टर गिरने लगा है छत टपक रही बच्चों को बैठें से लेकर खड़े होने तक कि व्यवस्था नही है और उस शाला में लगभग 20 बच्चे अपना भविष्य सवारने पढ़ाई कर रहे है जहां कक्षा पहली से लेकर पाँचवी तक कि क्लास लग रही है, और मात्र 20 बच्चों में दो दो शिक्षक नियुक्त है जिसमे शिक्षक श्रीमती यमुना टेकाम जो 1997 से एक ही शाला में पदस्त है एंव दूसरा शिक्षक महेश उइके जो कि वर्ष 2002 से एक ही जगह पदस्थ होकर अपनी सेवाएं दे रहें, वही जिले के विकास खण्ड घुघरी मवई में अधिकांश स्कूल शिक्षक विहीन है और कुछ स्कूल तो अतिथि शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे है और मुख्यालय के आसपास के स्कूलो बच्चों से अधिक शिक्षक पदस्त होने की जानकारी प्राप्त हो रही हैं, वही शिक्षक के द्वारा वताया की स्कूल भवन जो जर्जर जर्जर है और जहा तहा से पानी गिर रहा जिसकी जानकारी मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को जिनके समय समय पर स्कूल भवन के बारे में उच्च अधिकारियों को अवगत कराया गया है पर आज तक अधिकारियों के कान में जू तक नही रेगा जबकि बीजाडांडी वन ग्राम पुर्णतः आदिवासी ग्राम है जहां पर आदिवासी बच्चे ही पढ़ते है, पर बारिश के समय मे बच्चे को स्कूल भवन में ना बैठने की व्यवस्था है और खेलने के लिए मैदान है वही स्कूल शिक्षक अपने स्वयं के निजी मकान में कक्षाएं लगाई जा रही है और बच्चों को पढ़ाया जा रहा है सरकारी स्कूलों की विडंबना यह है कि दिन बा दिन स्कूलों में बच्चों की संख्या काम होती जा रही है जिसके चलते कई स्कूलों में विलय कर दिया गया है अब जब प्राथमिक स्कूलों में कक्षा पहली में दो दूसरी में पांच तीसरी में चार चौथी में तीन पांचवीं में पांच बच्चों की दर्ज संख्या है जिन्हें पढ़ाने के लिए दो शिक्षक की नियुक्ति की गई है। सरकार शासकीय स्कूलों के शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए व्यापक अभियान चलाई हुई है नवीन शिक्षण प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा का स्तर सुधारने के लिये संदीपनी विद्यालय तो कहीं पी एम श्री स्कूल की अवधारणा को जमीन पर लाने की योजना पर काम हो रहा है कि भवनों की स्थिति जर्जर है तो कहीं बैठने के संसाधन नही है बच्चों को बैठने के लिये डेस्क बेंच भी नही है अब ऐसे में सरकार कहती है कि हम बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रहे है ये सब बातें कहने में अच्छी लगती है पर जमीनी हकीकत कुछ नजर आती है
ऐसे स्कूलों में बच्चों को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सरकार के द्वारा ठेकेदारों के माध्यम से नल जल योजना लगाई गई है पर यह योजना से एक भी दिन बच्चों को पानी नही मिला है कार्य अधूरा है पर ठेकेदारों को इसका भुगतान हो चुका है
वही शासकीय स्कूल बीजाडांडी में 19 बच्चों में दो शिक्षक पदस्थ है ये दोनों शिक्षक स्थानीय ग्राम के निवासी है वही जिले में अन्य के स्कूलों में अतिथि के के भरोसे चल रहे है।
और क्या जिले के जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी जर्जर जर्जर भवन में पढ़ रहे बच्चों को राजस्थान के झालावाड़ स्कूल की हुई घटना जैसे मंडला में ही देखने का इंतजार कर रहे हैं।