दशहरा या ‘डीजे दरबार’? … जब पुलिस ने कानों में रूई ठूंस ली!
शहर गूंजता रहा डीजे की धुन पर, और पुलिस बजाती रही अपनी खामोशी की तान।
हाई कोर्ट के आदेश कागज़ पर थे ….. डीजे वालों ने तो उसे बेस में मिला दिया।
कानून की डेसिबल लिमिट से ज़्यादा थी पुलिस की लापरवाही की आवृत्ति।
पुलिस प्रशासन ने इस बार भी साबित किया ….. मौन ही उनका ‘एक्शन प्लान’ है।
ध्वनि प्रदूषण का मुकाबला जीत गया, प्रशासन की नाकामियाँ उपविजेता रहीं।
जबलपुर:संस्कारधानी में इस बार दशहरा का चल समारोह धार्मिक आयोजन से ज़्यादा डीजे शक्तिप्रदर्शन बन गया। सड़कों पर देवी दुर्गा की जय नहीं, बल्कि बेस की गूंज सुनाई दी … इतनी ज़ोर से कि भगवान भी सोच रहे होंगे, ये पूजा है या पावर टेस्ट?
गढ़ा दशहरा से शुरू हुई यह नव-परंपरा अब शहर के प्रशासन की नाकामियों का नया साउंडट्रैक बन चुकी है।
20 से 25 साउंड बॉक्स, गाड़ियों की छत पर रखे एम्पलीफायर, और पुलिस प्रशासन… बिल्कुल वहीं, जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए था … मूक दर्शक बनकर!
कानून नाम की चीज़ शायद वॉल्यूम बढ़ने से उड़ गई
हाई कोर्ट ने साफ़ आदेश दिए थे कि धार्मिक आयोजनों में ध्वनि प्रदूषण सीमित स्तर पर रखा जाए।
पर जब शहर में डीजे प्रतियोगिता चल रही हो तो कानून भी शायद किसी कोने में खड़ा कहता होगा …
भाइयो, अब तो मैं भी बहरा हो गया हूँ!
पुलिस प्रशासन को इस बार का पुरस्कार मिलना चाहिए … सर्वश्रेष्ठ मौन प्रदर्शन का।
न किसी ने देखा, न सुना, न कोई कार्रवाई की।
बस एक ही काम हुआ … देखते रहो, बजाते रहो।
सोशल मीडिया पर रीलें … और पुलिस की रील-एक्शन स्टाइल
अब सोशल मीडिया पर इन डीजे प्रतियोगिताओं की रीलें तैर रही हैं …
लोग थिरक रहे हैं, बॉक्स गूंज रहे हैं,
और पुलिस?
वो शायद रील देखने के बाद रिपोर्ट लिखने की योजना बना रही है।
कानफोड़ू गानों पर नाचते युवकों के वीडियो पूरे शहर में वायरल हैं, लेकिन प्रशासन को तो बस इतना फर्क पड़ा … लाइक कितने आए?
डॉक्टर बोले ‘ध्वनि से नुकसान’, पुलिस बोली ‘क्या कहा?’
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इतनी तेज़ ध्वनि से दिल के मरीजों पर असर पड़ सकता है, कानों की सुनने की क्षमता घट सकती है।
मगर पुलिस प्रशासन ने शायद पहले ही सुनने की क्षमता सस्पेंड कर दी है।
उनके लिए अब शोर, कानून, और जिम्मेदारी … सब ‘म्यूट मोड’ में हैं।
सवालों का शोर, जवाबों का सन्नाटा
अब शहर पूछ रहा है …
किसने इस डीजे मुकाबले को अनुमति दी?
क्या कोर्ट के आदेश सिर्फ कागज़ पर थे या डीजे की बेसलाइन में दब गए?
क्यों प्रशासन और पुलिस एक साथ आंख-मुंह-कान बंद कर बैठे रहे?
लोगों का कहना है …
शहर में शोर गूंजा, पुलिस की जुबान बंद रही … यही है जबलपुर की नई व्यवस्था।
अगर यही हाल रहा तो अगले साल दशहरा चल समारोह में एक नई प्रतियोगिता भी हो सकती है …
कौन-सा थाना सबसे ज्यादा मौन रहेगा?
और विजेता वही होगा, जिसकी पुलिस कानून की नहीं, डीजे की धुन पर थिरकेगी।
रिपोर्ट आरती लोधी