गली-गली में बिक रहा दूध गुणवत्ता और मात्रा दोनों में अधूरा, विभागीय कार्यवाही नदारद

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रेवांचल टाइम्स – मंडला, दूध वाले लोगों के लूटने में कोई कसर नही छोड़ रहे है और कहि न कही इन्हें जिम्मेदार विभाग का संरक्षण प्राप्त है जहाँ पर न कभी इनकी जाँच होती है और नही कोई रेख देख करने वाला है कितनी मात्रा में दूध गुणवत्ता युक्त है। विभाग की अनदेखी के चलते लोगो का बुरा हाल है वही दुग्ध केवल एक पेय पदार्थ नही है यह हर लोंगो का अभिन्न हिस्सा है बच्चों की सेहत बुजुर्गों की जरूरत और हर घर मे रोजमर्रा की जरूरत है दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है। यह हर उम्र के व्यक्ति के लिए आवश्यक पोषण का स्रोत है। लेकिन जब यही दूध बिना गुणवत्ता की जांच, बिना मात्रा की नाप-तोल और बिना किसी सरकारी नियंत्रण के गली गली,मोहल्ले- मोहल्ले फेरी लगाकर बेचा जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन फेरीवालों पर खाद्य विभाग या जिला प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। न तो दूध की गुणवत्ता की जांच की जा रही है, और न ही नापतौल की।

फेरीवालों के दूध का स्रोत संदिग्ध

वही शहर और कस्बों की गलियों में सुबह-सुबह दूध बेचने वाले फेरीवालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ये साइकिल, मोटरसाइकिल, में दूध लेकर आते हैं और स्थानीय निवासियों को दरवाज़े पर जाकर दूध बेचते हैं। अधिकांश लोग सुविधा और सस्ती कीमत के कारण इनसे दूध खरीद लेते हैं, लेकिन इस दूध की न तो कोई क्वालिटी जांच होती है और न ही इसकी उत्पत्ति का कोई रिकॉर्ड मौजूद होता है।
कई मामलों में यह दूध पास के गांवों से आता है जहाँ उत्पादन के समय उसमें पानी, या अन्य रसायनों की मिलावट कर दी जाती है। कभी-कभी पुराना दूध दोबारा गर्म कर के ताजा बताकर बेचा जाता है।

नापतौल की खुली लूट

वही एक और गंभीर समस्या है नापतौल की धोखाधड़ी। अधिकतर फेरीवाले 1 लीटर कहकर 800 से 900 मिली ग्राम दूध ही देते हैं। ना तो इनके पास किसी प्रकार की प्रमाणित मापक होती है, और ना ही ग्राहक कभी इसकी जांच करते हैं।”
ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ ग्राहकों को रोजाना के आधार पर नापतौल में धोखा दिया जा रहा है, जिससे साल भर में हजारों रुपये की चपत लगती है।
प्रशासन और खाद्य विभाग की चुप्पी

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग, नापतौल विभाग और जिम्मेदार संस्थाएं पूरी तरह मौन हैं। किसी प्रकार की नियमित जांच नहीं होती, न ही कोई लाइसेंस की जांच की जाती है। दूध बेचने वालों से न तो FSSAI रजिस्ट्रेशन मांगा जाता है, और न ही दूध की शुद्धता का कोई प्रमाण पत्र।
कई बार जनता द्वारा शिकायत करने पर भी विभाग या तो बहाना बना देता है या “जांच की जाएगी” कहकर मामले को रफा-दफा कर देता है।
जनता की मजबूरी या लापरवाही?
बहुत से लोग मानते हैं कि फेरीवाला दूध ताजा होता है और “ब्रांडेड दूध कंपनियां केमिकल डालती हैं”। इसी सोच के चलते वे गुणवत्ता और नापतौल की जांच करने की जरूरत महसूस ही नहीं करते। यह सोच न केवल उन्हें वित्तीय नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि उनकी और उनके बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर डाल रही है।
“फेरीवालों द्वारा बेचा जाने वाला दूध बिना किसी जांच के होता है। यह न केवल मिलावटी हो सकता है, बल्कि संक्रमण युक्त भी हो सकता है। ऐसे दूध से बच्चों में दस्त, उल्टी, कमजोरी, और लंबे समय में किडनी व लिवर से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।”
वही नापतौल विभाग की ओर से मापक यंत्रों की प्रमाणिकता अनिवार्य है।
लेकिन गली-गली दूध बेचने वालों में से 90% इन मानकों का पालन नहीं करते।
प्रशासनिक स्तर पर फेरीवालों का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए।खुले दूध की गुणवत्ता की नियमित जांच हो।नापतौल विभाग द्वारा हर 6 महीने में मापक यंत्रों की जांच अनिवार्य हो।मिलावटी दूध बेचने वालों पर कठोर कार्रवाई, जुर्माना का प्रावधान हो। प्रशासन की चुप्पी इस अपराध की मौन स्वीकृति। यदि जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो न केवल जनता की सेहत से खिलवाड़ होता रहेगा, बल्कि लोगों का भरोसा भी खाद्य व्यवस्था से उठ जाएगा।

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