मंडला जिले में खनिज माफियाओं का बेलगाम दोहन, प्राकृतिक सौंदर्य पर मंडरा रहा खतरा

रेवांचल टाइम्स मंडला मध्यप्रदेश का आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला अपनी समृद्ध प्राकृतिक विरासत, घने जंगलों, उपजाऊ कृषि भूमि, पठारी भू-भाग और कल-कल बहती नदियों के लिए जाना जाता है। यह जिला न केवल जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी इसे एक अलग पहचान देता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस प्रकृति ने मंडला को समृद्ध बनाया, उसी प्रकृति के साथ आज खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है। खनिज माफियाओं द्वारा दिन-रात किए जा रहे अवैध उत्खनन ने जिले की सुंदरता पर मानो ग्रहण लगा दिया है।जिले में बड़े पैमाने पर मुर्रम, गिट्टी और पत्थरों का अवैध दोहन किया जा रहा है। जंगलों के भीतर और आसपास बिना अनुमति के खदानें खोदी जा रही हैं,और मुर्रम निकली जा रहीं है जिससे वन क्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है। इसका सीधा असर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर पड़ रहा है। जहां पहले घने जंगल नजर आते थे, वहां अब बड़े-बड़े गड्ढे और उजड़ी हुई जमीन दिखाई देने लगी है।
अधिक उत्खनन का असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि नदी-नालों के स्वरूप में भी भारी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। जमीन के नीचे से मुर्रम और पत्थर निकालने के कारण जलस्रोत प्रभावित हो रहे हैं। कई स्थानों पर प्राकृतिक जलधाराएं या तो सूखने लगी हैं या अपना रास्ता बदल चुकी हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति भी उत्पन्न हो रही है।
धरातल के नीचे से अंधाधुंध उत्खनन के कारण कई स्थानों पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं, जिन्हें स्थानीय लोग “पातालकोट” की संज्ञा देने लगे हैं। ये गहरे गड्ढे न केवल पर्यावरण के लिए खतरा हैं, बल्कि मानव और पशुओं के लिए भी जानलेवा साबित हो सकते हैं। बारिश के मौसम में इन गड्ढों में पानी भर जाता है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका और बढ़ जाती है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडला जिले की ग्राम पंचायत चिचौली में संचालित चंडिका स्टोन क्रेशर द्वारा नियमों को ताक पर रखकर पत्थरों का उत्खनन किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि क्रेशर बिना तय मापदंडों और स्वीकृत सीमा के खुदाई कर रहा है। क्रेशर के किनारे पूर्व में की गई खुदाई से एक बहुत बड़ा तालाब नुमा गड्ढा बन गया है, जिसे यूं ही छोड़ दिया गया है। न तो वहां किसी प्रकार की फेंसिंग की गई है और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया है। यह स्थिति किसी बड़ी दुर्घटना को निमंत्रण दे रही है।नियमों के अनुसार किसी भी स्टोन क्रेशर को अपनी लीज अवधि, स्वीकृत रकबा, पर्यावरण स्वीकृति और अन्य जरूरी जानकारियों का बोर्ड स्थल पर लगाना अनिवार्य होता है, लेकिन चंडिका स्टोन क्रेशर परिसर में ऐसा कोई बोर्ड नजर नहीं आता। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर यह क्रेशर कब से संचालित हो रहा है, इसकी लीज कब तक वैध है और इसे कितने क्षेत्र में उत्खनन की अनुमति दी गई है।सूत्रों से जानकारी अनुसार क्रेशर संचालक द्वारा लगातार नई जगहों पर खुदाई की जा रही है। पहले जहां पत्थर निकाले गए, वहां गहरे गड्ढे बन चुके हैं और अब दूसरी जगह उत्खनन कार्य शुरू कर दिया गया है। इससे पूरे क्षेत्र की भौगोलिक संरचना ही बदलती जा रही है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए नियमों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के दिशा-निर्देशों का भी खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। क्रेशर से उड़ने वाली धूल आसपास के गांवों तक पहुंच रही है, जिससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। खेतों पर धूल की परत जमने से फसलों को भी नुकसान हो रहा है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन सब गतिविधियों के बावजूद खनिज विभाग की भूमिका सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खनिज विभाग के अधिकारी सब कुछ देखकर भी अनजान बने हुए हैं। न तो किसी प्रकार की जांच की जा रही है और न ही अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने आई है। इससे विभाग और खनिज माफियाओं के बीच सांठगांठ की आशंका गहराती जा रही है। खनिज विभाग आंखों पर पट्टी बांधकर और कानों में रुई डालकर कार्य कर रहा है। यदि समय रहते इन अवैध गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में मंडला जिले की प्राकृतिक पहचान केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।प्रकृति प्रेमियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि मंडला जैसे आदिवासी और प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर जिले में खनिज दोहन पूरी तरह नियमों के तहत और पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाते हुए होना चाहिए। लेकिन वर्तमान हालात यह दर्शाते हैं कि मुनाफे की अंधी दौड़ में प्रकृति और आदिवासी जीवन दोनों को कुचला जा रहा है।अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन और खनिज विभाग कब जागता है और अवैध उत्खनन के खिलाफ सख्त कदम उठाता है। यदि जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो मंडला की हरियाली, जलस्रोत और प्राकृतिक सौंदर्य गंभीर संकट में पड़ सकता है, जिसकी भरपाई करना भविष्य में संभव नहीं होगा।