होटल की आड़ में चल रहे जिस्म फरोशी के अड्डे
जिम्मेदारों के संरक्षण में खुलेआम नियमों की उड़ा रहे धज्जियां, नाबालिगों अौर महिलाअों की सुरक्षा पर सवाल
*दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर*अतुल कुमार*
संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर शहर में इन दिनों होटल कारोबार की आड़ में चल रहे अवैध और अनैतिक गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में स्थित कुछ होटलों पर जिस्मफरोशी का धंधा खुलेआम चलने के आरोप सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का दावा है कि यह पूरा नेटवर्क शासन-प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर नहीं, बल्कि कुछ मामलों में कथित तौर पर संरक्षण लेकर संचालित किया जा रहा है। इससे न केवल कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है, बल्कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर भी गहरी चिंता उत्पन्न हो गई है।
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पड़ोसियों की शिकायतें, पर कार्रवाई नदारद
शहर के जिन इलाकों में ये होटल संचालित हैं, वहां रहने वाले नागरिक लंबे समय से असामान्य गतिविधियों की शिकायत करते आ रहे हैं। देर रात तक संदिग्ध आवाजाही, बाहरी लोगों का लगातार आना-जाना, गुप्त तरीके से कमरों का आवंटन और पहचान पत्रों की औपचारिकता निभाकर नजरअंदाज किया जाना, ये सब संकेत उस अवैध धंधे की ओर इशारा करते हैं, जो होटल व्यवसाय की आड़ में पनप रहा है।
स्थानीय रहवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार थाना स्तर पर शिकायतें कीं, लेकिन या तो शिकायत दर्ज नहीं की गई या फिर औपचारिक जांच के बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक उदासीनता या मिलीभगत इस पूरे खेल को बढ़ावा दे रही है।
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थानाें और प्रशासन की नाक के नीचे कारोबार
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ होटल ऐसे इलाकों में स्थित बताए जा रहे हैं, जहां पुलिस थाने और प्रशासनिक कार्यालय नजदीक हैं। इसके बावजूद अवैध गतिविधियों का निर्बाध संचालन यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
सूत्रों का दावा है कि कुछ होटल संचालक नियमित रूप से अनुमति या सेटिंग के नाम पर कथित तौर पर लेन-देन करते हैं, जिससे वे बेखौफ होकर नियमों को ताक पर रखकर धंधा चला सकें। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है, लेकिन बार-बार सामने आ रही शिकायतें इस मुद्दे को हल्के में लेने की इजाजत नहीं देतीं।
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नाबालिगों के शोषण की आशंका
इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू नाबालिग बच्चों की संभावित संलिप्तता और शोषण का है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि होटलों में पहचान पत्रों की सख्ती से जांच नहीं की जा रही, तो यह मानव तस्करी और बाल यौन शोषण जैसे जघन्य अपराधों का रास्ता खोल देता है।
कानून के अनुसार, किसी भी होटल में मेहमानों की पहचान और उम्र का सत्यापन अनिवार्य है, लेकिन आरोप है कि इन तथाकथित अवैध होटलों में यह प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक सीमित है। यदि नाबालिगों को इन गतिविधियों में धकेला जा रहा है, तो यह न केवल कानून का घोर उल्लंघन है, बल्कि समाज के लिए भी एक गंभीर खतरा है।
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होटल मानकों की खुलेआम अनदेखी
पर्यटन विभाग और नगर निगम द्वारा निर्धारित होटल मानकों की बात करें तो सुरक्षा, सीसीटीवी, रजिस्टर में सही एंट्री, अग्नि सुरक्षा, स्वच्छता और कर्मचारियों का सत्यापन जैसे कई नियम हैं। आरोप है कि जिन होटलों में अवैध गतिविधियां चल रही हैं, वहां इनमें से अधिकांश मानकों का पालन नहीं किया जा रहा।
कुछ होटलों में न तो सीसीटीवी कैमरे सही ढंग से कार्यरत हैं और न ही कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन हुआ है। यह स्थिति किसी भी अप्रिय घटना की जिम्मेदारी तय करने में बड़ी बाधा बन सकती है।
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महिला सुरक्षा और शहर की छवि पर असर
जबलपुर को सांस्कृतिक और शैक्षणिक नगरी के रूप में जाना जाता है। ऐसे में यदि शहर में होटल आधारित जिस्मफरोशी के अड्डे फल-फूल रहे हैं, तो यह न केवल महिला सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि शहर की सामाजिक छवि को भी धूमिल करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां संगठित अपराध को बढ़ावा देती हैं और भविष्य में गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकती हैं।
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प्रशासन से जवाबदेही की मांग
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस पूरे मुद्दे पर गंभीरता दिखाएगा? क्या संबंधित होटलों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषी पाए जाने पर होटल लाइसेंस रद्द होंगे और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी?
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों की मांग है कि होटल उद्योग की व्यापक जांच हो, संदिग्ध होटलों पर छापेमारी की जाए और यदि नाबालिगों या महिलाओं के शोषण के प्रमाण मिलते हैं, तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए।
जबलपुर में होटल व्यवसाय की आड़ में चल रही कथित जिस्मफरोशी केवल एक नैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि गंभीर कानूनी और सामाजिक संकट है। यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसका दुष्परिणाम पूरे शहर को भुगतना पड़ सकता है।
अब जरूरत है पारदर्शी जांच, जवाबदेह प्रशासन और निर्भीक कार्रवाई की—ताकि कानून का डर कायम हो और संस्कारधानी की पहचान सुरक्षित रह सके।