राजनीति अब सेवा नहीं, एक व्यवसाय बन चुकी है जहाँ भावनाएँ बिकती हैं और वोट खरीदे जाते हैं…
लेखक चंद्रकांत सी पूजारी
गुजरात
दैनिक रेवांचल टाईम्स – कभी राजनीति को सेवा का सबसे पवित्र माध्यम माना जाता था। यह वह मार्ग था, जहाँ व्यक्ति अपने निजी हितों से ऊपर उठकर समाज, देश और लोकतंत्र के हित में कार्य करता था। राजनीति में प्रवेश का अर्थ था—त्याग, सिद्धांत, संघर्ष और जनकल्याण। परंतु आज के समय में राजनीति का यह स्वरूप धुंधला पड़ता जा रहा है। अब राजनीति सेवा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित व्यवसाय बनती जा रही है, जहाँ भावनाएँ बिकती हैं और वोट खरीदे जाते हैं।
आज राजनीति एक ऐसे बाज़ार में बदल चुकी है, जहाँ जनता उपभोक्ता है और नेता विक्रेता। चुनाव अब विचारों की नहीं, बल्कि ब्रांडिंग की प्रतियोगिता बन गए हैं। नारों की पैकेजिंग, भावनात्मक भाषणों की मार्केटिंग और झूठे वादों की चमक-दमक के बीच असली मुद्दे कहीं खो जाते हैं।
आधुनिक राजनीति की सबसे बड़ी पूँजी जनता की भावनाएँ हैं। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्रवाद—इन सबका प्रयोग अब जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्ति के हथियार के रूप में किया जाता है। भावनाओं को उकसाया जाता है, डर पैदा किया जाता है, नफ़रत को हवा दी जाती है और उम्मीदों को बेच दिया जाता है।
जब मुद्दों पर बात करने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तब भावनाओं का सहारा लिया जाता है। बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे वास्तविक प्रश्नों पर मौन साध लिया जाता है और जनता को ऐसे मुद्दों में उलझा दिया जाता है, जिनसे सत्ता तो मिल सकती है, पर समाधान नहीं।
*उदाहरण:* भारत के 2019 लोकसभा चुनावों में, कुछ राजनीतिक दलों ने राष्ट्रवाद और सीमा सुरक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दों को प्रमुखता देकर जनता की भावनाओं को भुनाया। जबकि आर्थिक मंदी और किसानों की समस्याओं जैसे वास्तविक मुद्दों पर कम ध्यान दिया गया, जिससे सत्ता प्राप्ति तो हुई, लेकिन लंबे समय में जनहित प्रभावित हुआ।
वोट: अधिकार से वस्तु तक
लोकतंत्र में वोट नागरिक का सबसे बड़ा अधिकार होता है। यह उसकी आवाज़, उसकी शक्ति और उसकी पहचान है। परंतु आज यह अधिकार धीरे-धीरे एक वस्तु में बदलता जा रहा है। कहीं शराब के बदले वोट, कहीं पैसे के बदले समर्थन, कहीं जातिगत दबाव, तो कहीं झूठे वादों का लालच।
वोट खरीदने की यह संस्कृति लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है। जब वोट बिकता है, तब सत्ता जनता की नहीं रहती, बल्कि पूँजी की हो जाती है। ऐसे में शासन जनहित का नहीं, बल्कि निवेश पर लाभ कमाने का माध्यम बन जाता है।
आज राजनीति और पूँजी का रिश्ता इतना गहरा हो चुका है कि दोनों को अलग करना कठिन हो गया है। चुनाव लड़ना अत्यंत महँगा हो गया है—प्रचार, रैलियाँ, सोशल मीडिया, विज्ञापन—सब कुछ करोड़ों में सिमट गया है। ऐसे में आम और ईमानदार व्यक्ति के लिए राजनीति में प्रवेश लगभग असंभव होता जा रहा है।
जो सत्ता में आता है, वह पहले अपने खर्च की भरपाई करता है, फिर लाभ कमाने की सोचता है। ठेके, घोटाले, नीतियों में हेरफेर—सब इसी व्यवसायिक राजनीति की उपज हैं।
राजनीति कभी आदर्शों की पाठशाला थी। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, नेहरू, लोहिया जैसे नेताओं ने राजनीति को नैतिकता से जोड़ा। आज वही राजनीति अवसरवाद, दल-बदल और स्वार्थ की प्रयोगशाला बन चुकी है।
सिद्धांत अब बोझ लगने लगे हैं और ईमानदारी कमजोरी समझी जाती है। सत्ता के लिए रिश्ते, विचार और मूल्य—सब त्याग दिए जाते हैं। राजनीति अब चरित्र निर्माण नहीं, बल्कि चरित्र हनन का साधन बनती जा रही है।
इस गिरावट के लिए केवल राजनेता ही दोषी नहीं हैं। जनता की चुप्पी, उसकी उदासीनता और उसका तात्कालिक लाभ भी इस व्यवसायिक राजनीति को बढ़ावा देता है। जब हम सवाल पूछना बंद कर देते हैं, जब हम जाति या लालच के आधार पर वोट देते हैं, तब हम स्वयं लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।
लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है, बल्कि जागरूकता, विवेक और निरंतर प्रश्न करने की प्रक्रिया है। यदि जनता सचेत होगी, तो राजनीति को फिर से सेवा का मार्ग बनाया जा सकता है।
वही राजनीति का सेवा से व्यवसाय बन जाना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य का संकेतक है। यदि भावनाएँ यूँ ही बिकती रहीं और वोट यूँ ही खरीदे जाते रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल एक दिखावटी लोकतंत्र विरासत में पाएँगी।अब समय है कि राजनीति को फिर से मूल्यों से जोड़ा जाए, सत्ता को सेवा का साधन बनाया जाए और लोकतंत्र को बाज़ार से निकालकर जनचेतना के मंच पर स्थापित किया जाए। क्योंकि जब राजनीति सुधरती है, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित होता है।
!!जय हिंद, जय भारत!!