अभिशप्त संपत्ति: अलीराजपुर रियासत की कथा

लेखक: विक्रम सेन (वरिष्ठ पत्रकार)

दैनिक रेवाँचल टाईम्स – रीजेंसी का अंधकार, केसर सिंह की दावेदारी, अलीराजपुर का रक्त-संघर्ष और रानी का शाप*

नर्मदा की लहरें रात में भी थकती नहीं थीं, जैसे वे सदियों से बहते रक्त की कहानियाँ सुनाती चली जाती हों। अलीराजपुर के किले की दीवारें अब भी गूंज रही थीं, रानी के श्राप की उस अंतिम चीख से, जो धरमपुर की ओर जाती सड़क पर गुम हो गई थी। राणा प्रताप सिंह प्रथम का सिंहासन अब खाली था, लेकिन खालीपन में भी एक भयावह जीवन था। राज्य की सत्ता अब किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं थी; वह अब रीजेंसी के अंधकार में डूबी थी, एक ऐसा अंधकार जहां सूर्य की पहली किरण भी संदेह की छाया में डूबी रहती।

सन् 1818 का वह वर्ष था जब मराठा साम्राज्य के अवशेष बिखर रहे थे, और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मालवा की हर छोटी रियासत पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी। राणा प्रताप सिंह प्रथम की मृत्यु ने अलीराजपुर को एक अनाथ की तरह छोड़ दिया था। रानी, जो अब विधवा हो चुकी थीं, अपने गर्भ में पलते उत्तराधिकारी को सहेजे हुए महल के एकांत में बैठी रहतीं। वह जानती थीं कि यह गर्भ केवल एक बच्चा नहीं था; यह रियासत का भविष्य था, वंश की आखिरी उम्मीद। लेकिन उम्मीद के साथ अभिशाप की परछाईं भी थी, धरमपुर की रानी का वह शाप, जो अब जैसे हवा में घुल गया था। लोक में हर मानस पर अंकित था।

महल के मुख्य द्वार पर पहरा देने वाले सैनिकों की बातें रानी के कानों तक पहुँचतीं। एक सैनिक फुसफुसाया, “महारानी जी, सुनते हैं कि जोबट से केसर सिंह की सेना इधर आ रही है। वह कहता है कि गद्दी उसकी है, वंश का हकदार वह है।” रानी की आँखें सजल हो आईं। वह जानती थीं कि केसर सिंह कोई साधारण विद्रोही नहीं था; वह राठौर वंश की ही शाखा से था, मोटीपोल के ठाकुर, जो जोबट रियासत से निकट संबंध रखते थे। केसर सिंह का जन्म 18वीं सदी के अंत में हुआ था, जब राठौरों की शाखाएँ मालवा की पहाड़ियों में फैल रही थीं। उनका दावा केवल महत्वाकांक्षा नहीं था; वह वंशीय इतिहास पर आधारित था। कन्नौज के राजा जयचंद से निकली राठौर शाखा दो भागों में बँटी थी, एक जोधपुर गई, और दूसरी मालवा में ठहरी। जगदेव से निकली इस शाखा ने 1380 में मोटीपोल (भाबरा के पास) में किला बनाया, और यहीं से जोबट एवं अलीराजपुर का जन्म हुआ। केसर सिंह मोटीपोल के ठाकुर थे, और उनका भाई जोबट का शासक था। यह असमानता केसर सिंह के मन में जहर घोलती गई। वह सोचता था, “यदि जोबट मेरा रक्त है, तो अलीराजपुर क्यों नहीं? यह गद्दी मेरी है, मेरे पूर्वजों की।”

रानी ने सेविका को बुलाया और कहा, “सुनो, यदि केसर सिंह आ रहा है, तो बताओ कि यह गद्दी किसी के दावे की नहीं, बल्कि वंश की है। लेकिन यदि वह नहीं माना, तो याद दिलाना, धरमपुर की रानी का श्राप इस भूमि पर मंडरा रहा है। जो इस संपत्ति को हड़पेगा, उसका जीवन नरक बन जाएगा।” सेविका ने सिर झुकाया, लेकिन उसके मन में डर था। रीजेंसी का यह काल, जब कोई वयस्क शासक नहीं था, सत्ता के शून्य को आमंत्रित करता था। ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंटों की नजरें रियासत पर थीं, लेकिन स्थानीय ठाकुरों की महत्वाकांक्षा इससे अछूती नहीं थी।

केसर सिंह की सेना मोटीपोल से निकली। वह घोड़े पर सवार, तलवार कमर से बँधी, अपने साथियों से बोला, “भाइयो, आज हम इतिहास बदलेंगे! अलीराजपुर का सिंहासन हमारा हक है। राठौरों का रक्त हममें बहता है, जयचंद से लेकर जगदेव तक, हमारी नसों में वह शक्ति है। प्रताप सिंह की मृत्यु ने दरवाजा खोल दिया है। गर्भ में पलता बच्चा अभी राजा नहीं, हम हैं!” उसके साथी, कुछ आदिवासी सरदार, कुछ राजपूत योद्धा ने जयकारा लगाया। केसर सिंह का दावा मजबूत था: वह वंश की शाखा से था, और जोबट के साथ उसका पारिवारिक बंधन था। लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा अंधी थी, वह भूल गया था कि रियासत केवल भूमि नहीं, बल्कि लोगों की निष्ठा भी थी।

सेना सीमावर्ती गाँवों में पहुँची। नानपुर, छकतला जैसे गाँवों में लूटपाट शुरू हुई। केसर सिंह ने एक गाँव के सरदार से कहा, “यहाँ का खजाना हमारे लिए है। अलीराजपुर का राजा बनकर मैं तुम्हें पुरस्कृत करूँगा।” सरदार ने डरते हुए जवाब दिया, “महाराज, लेकिन रानी का गर्भ… वह वंश की आखिरी कड़ी है। और सुनते हैं कि धरमपुर की रानी ने श्राप दिया है। यह संपत्ति अभिशप्त है!” केसर सिंह हँसा, “श्राप? श्राप तो कमजोरों का हथियार है। मैं शक्ति हूँ!” लेकिन उसकी हँसी में एक कंपकंपी थी। गाँव जल रहे थे, धुएँ के गुबार आकाश छू रहे थे। रीजेंसी का यह अंधकार अब रक्त से रंगा जा रहा था।

महल में खबर पहुँची। रानी ने अपने विश्वस्त मंत्री मुसाफिर मकरानी को बुलाया। मुसाफिर, जो अफगान मूल का था लेकिन रियासत की सेवा में वर्षों से था, घुटनों पर बैठा और बोला, “महारानी, केसर सिंह की सेना करीब है। वे दावा करते हैं कि वंश का हकदार वे हैं। क्या आदेश है?” रानी ने गहरी साँस ली, उसके चेहरे पर दर्द था,वो गर्भ की पीड़ा और राज्य की चिंता। वह बोली, “मुसाफिर, तुम मेरे पति के विश्वस्त थे। अब मेरे बच्चे की रक्षा करो। यदि केसर सिंह आए, तो बताओ कि यह गद्दी किसी ठाकुर की नहीं, बल्कि राठौरों की पवित्र परंपरा की है। और यदि वह नहीं माने, तो याद दिलाओ, धरमपुर की रानी का श्राप इस भूमि पर है। जो अन्याय करेगा, उसका वंश मिट्टी में मिल जाएगा।” मुसाफिर ने सिर झुकाया, “जैसी आज्ञा, महारानी। लेकिन ब्रिटिश एजेंट को सूचित करूँ?” रानी ने सहमति दी, “हाँ, क्योंकि अब समय बदल रहा है। तलवारें नहीं, संधियाँ राज करेंगी।”

केसर सिंह की सेना महल के निकट पहुँच गई। युद्ध की तैयारी थी। केसर सिंह ने महल के द्वार पर खड़े होकर चिल्लाया, “अलीराजपुर की प्रजा! मैं केसर सिंह, मोटीपोल का ठाकुर, तुम्हारा सच्चा राजा हूँ! प्रताप सिंह की मृत्यु ने गद्दी खाली कर दी है। रानी का गर्भ अभी अजन्मा है, मैं वंश का रक्षक हूँ!” भीड़ में से कुछ आदिवासी सरदारों ने समर्थन किया, लेकिन अधिकांश मौन रहे। मुसाफिर मकरानी द्वार पर आया और गरजा, “केसर सिंह, पीछे हटो! यह गद्दी राठौरों की है, न कि विद्रोहियों की। धरमपुर की रानी का श्राप मत भूलो, जो इस संपत्ति को हड़पेगा, उसका जीवन नरक बन जाएगा!” केसर सिंह हँसा, लेकिन उसकी आँखों में संदेह था। “श्राप? मैं डरता नहीं! आज मैं राजा बनूँगा!”

युद्ध छिड़ गया। तलवारें खनकीं, धनुषों से बाण चले। अलीराजपुर की सीमाएँ रक्त से लाल हो गईं। केसर सिंह की सेना ने कई गाँवों पर कब्जा कर लिया, लेकिन मुसाफिर की वफादारी ने महल को बचाया। रानी महल के ऊपरी कक्ष में बैठी प्रार्थना कर रही थीं: “हे देवी, मेरे गर्भ की रक्षा करो। यह शाप मेरे पति का पाप था, किंतु मेरे बच्चे को मत छीनो।” बाहर की चीखें उसके कानों तक पहुँच रही थीं। केसर सिंह के योद्धा चिल्ला रहे थे, “गद्दी हमारी है!” लेकिन अभिशाप की परछाईं जैसे उन पर मंडरा रही थी। एक योद्धा ने केसर सिंह से कहा, “महाराज, यह भूमि अभिशप्त लगती है। हमारे साथी मर रहे हैं!” केसर सिंह ने डाँटा, “चुप! हम जीतेंगे!”

लेकिन जीत का सपना लंबा नहीं चला। ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट, सर जॉन माल्कम, को खबर मिली। मालवा में ब्रिटिश की बढ़ती पकड़ थी, मंदसौर की संधि (1818) ने मराठाओं को कमजोर कर दिया था। सर माल्कम ने धार रियासत को पत्र लिखा: “अलीराजपुर हमारी संरक्षित रियासत है। विद्रोह दबाओ, अन्यथा हस्तक्षेप होगा।” धार की सेना आई, जो पहले से ही अलीराजपुर से संरक्षण शुल्क वसूलती थी। धार की रानी मीनाबाई, जो बहादुर महिला थीं, ने अपने सेनापतियों को आदेश दिया: “केसर सिंह को पकड़ो। यह विद्रोह धार के अधिकार पर हमला है।” धार की सेना ने केसर सिंह को घेर लिया। युद्ध में केसर सिंह के कई निकट संबंधी मारे गए, साथी गिरफ्तार हुए। केसर सिंह भाग निकला, लेकिन उसके मन में डर था। वह मोटीपोल लौटा, और बोला, “यह गद्दी… अभिशप्त थी। धरमपुर की रानी का श्राप सच साबित हुआ।”

ब्रिटिश ने अलीराजपुर को संरक्षित रियासत घोषित कर दिया। मुसाफिर मकरानी को रीजेंट नियुक्त किया गया, लेकिन वह ज्यादा समय नहीं चला। रानी ने जन्म दिया जशवंत सिंह को। लेकिन रीजेंसी का अंधकार बना रहा। ब्रिटिश एजेंट ने दरबार में कहा, “यह राज्य अब ब्रिटिश संरक्षण में है। विद्रोह की कीमत चुकानी होगी।” केसर सिंह के गिरफ्तार साथी अलीराजपुर की काल कोठरी में सड़ते रहे। एक कैदी ने दीवार पर खरोंचकर लिखा, “शाप ने हमें निगल लिया।” केसर सिंह का वंश समाप्त नहीं हुआ, लेकिन इतिहास से बाहर हो गया। मोटीपोल की हवेली धीरे-धीरे सुनसान हो गई। रखवाले चले गए, आवाजें बंद हो गईं। आज वह खंडहर है, जहां हवाएँ चीखती हैं, “अन्याय की कीमत पीढ़ियाँ चुकाती हैं।”

रानी ने महल में बैठकर सोचा, “यह गर्भ बच गया, लेकिन शाप का साया बना रहा। केसर सिंह का विद्रोह एक शुरुआत था, अलीराजपुर का रक्त-संघर्ष अभी थमा नहीं है।” जशवंत सिंह बड़ा हुआ, लेकिन रीजेंसी के वर्षों में राज्य की सत्ता ब्रिटिश के हाथों में थी। धार का संरक्षण शुल्क 10,000 रुपये तय हुआ, जो 1933 तक चला। रानी ने सेविका से कहा, “देखो, धार भी इस शाप से नहीं बचेगी। उनके राजा असमय मरते हैं, यथा आनंदराव II 1807 में, रामचंद्रराव I 1810 में, रामचंद्रराव II 1833 में। यह संयोग नहीं, शाप है।” सेविका ने सिर झुकाया, “महारानी, मीनाबाई की बहादुरी की कहानियाँ तो प्रसिद्ध हैं, लेकिन शाप की गूंज हर जगह है।”

केसर सिंह के अंतिम वर्ष दुखद थे। वह मोटीपोल में छिपा रहा, और उसके पुत्र ने पूछा, “पिता जी, क्यों हमने विद्रोह किया?” केसर सिंह ने जवाब दिया, “लालच ने… लेकिन धरमपुर की रानी का श्राप सच था। हमारी हवेली खंडहर बन जाएगी, वंश ओझल हो जाएगा।” और वैसा ही हुआ। मोटीपोल की दीवारें ढह गईं, छतें गिर गईं। स्थानीय लोग कहते हैं, “यह शाप से नष्ट हुई हवेली है।” इतिहास में केसर सिंह एक साहसी लेकिन समय से पराजित व्यक्ति है, वह मारा नहीं गया, दंडित नहीं किया गया, बस अप्रासंगिक कर दिया गया। उसका वंश समाप्त नहीं हुआ, लेकिन सत्ता से पृथक हो गया। कालांतर में लुप्त प्राय: हो गया।

अलीराजपुर ने यह विद्रोह देखा, और ब्रिटिश संरक्षण में आ गया। लेकिन अभिशाप का अंधकार फैलता गया। रानी ने अंतिम शब्द कहे, “यह शाप मेरे पति का पाप था, लेकिन केसर सिंह जैसे लोग इसे जीवित रखते हैं। गद्दी बच गई, लेकिन सत्ता अभिशप्त है।” रीजेंसी का काल अब नई चुनौतियों से भरा था। ब्रिटिश नियंत्रण, अजन्मे उत्तराधिकारी की सत्ता, और भविष्य के विवादों का बीज। अभिशाप की कथा यहां से और गहराती है, जहां हर महत्वाकांक्षा नरक का द्वार खोलती है।

*अध्याय–3 का सबक:*

*गर्भ की रक्षा में तलवारें नहीं, नियति होती है। केसर सिंह का विद्रोह एक चेतावनी है। शापित संपत्ति हड़पने की कोशिश में जीवन नरक बन जाता है। जोबट (भाबरा मोटीपोल) के महल खंडहर होकर चीखते हैं, और अलीराजपुर महल की दीवारें चुपचाप सिसकती हैं।*

कल पढ़ें

*अध्याय–4: राजा जसवंत सिंह के दो पुत्र हुए और रानी का शाप क्या उन्हें खा गया? क्या यह राज गद्दी 19वीं सदी देख सकी? कल पढ़े सनसनीखेज अभिशाप का चरम)*

Leave A Reply

Your email address will not be published.