डीईओ कार्यालय में फर्जी अनुकंपा नियुक्ति का बड़ा खुलासा, लाखों के लेनदेन की आशंका, जांच के नाम पर लीपापोती

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रीवा। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय में अनुकंपा नियुक्तियों को लेकर एक बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। मामले में प्रथम दृष्टया लाखों रुपए के लेनदेन और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति दिए जाने की बात सामने आई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस अधिकारी की संलिप्तता पर सवाल उठ रहे हैं, उसी को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

सूत्रों के अनुसार, बृजेश कुमार कोल नामक युवक ने अपनी माता बेलाकली कोल के निधन के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन किया था। लेकिन अब यह सामने आया है कि उक्त महिला विभाग में कभी पदस्थ ही नहीं थीं। बावजूद इसके, आवेदन मिलने के मात्र 10–15 दिनों के भीतर बृजेश कोल को प्यून के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दे दी गई — वह भी डीईओ कार्यालय की अनुमोदन प्रक्रिया से गुजरते हुए।

इस पूरे मामले में अनुकंपा नियुक्ति प्रभारी लिपिक रामप्रसन्न द्विवेदी द्वारा तैयार की गई नोटशीट पर योजना अधिकारी एवं प्रभारी लिंक अधिकारी अखिलेश मिश्रा ने अनुमोदन प्रदान किया था, जिसके आधार पर डीईओ के हस्ताक्षर से नियुक्ति आदेश जारी हुआ। आरोप है कि इस प्रक्रिया में ऊपरी स्तर से निचले स्तर तक मोटी रकम का लेन-देन हुआ।

आदेश मिलते ही ज्वाइनिंग, वेतन के वक्त हुआ खुलासा

बृजेश कोल ने आदेश प्राप्त होते ही संबंधित संस्था में ज्वाइनिंग भी दे दी और कई महीनों तक कार्य भी किया। बाद में जब वेतन आहरण हेतु संकुल प्राचार्य से यूनिक आईडी जनरेट कराने का दबाव बनाया गया, तब मामला उजागर हुआ। प्राचार्य ने जब मृतक बेलाकली कोल के विभागीय रिकार्ड खंगाले तो पता चला कि ऐसी कोई महिला कभी विभाग में पदस्थ ही नहीं रही। इसके बाद उन्होंने वेतन देने से इनकार करते हुए डीईओ कार्यालय को सूचित किया।

फर्जीवाड़ा उजागर होते ही लीपापोती शुरू

मामला सार्वजनिक होते ही जिला शिक्षा अधिकारी ने हड़बड़ी में जांच समिति का गठन कर दिया। लेकिन यहां सबसे बड़ी चूक सामने आई — जिस योजना अधिकारी अखिलेश मिश्रा के अनुमोदन पर यह फर्जी नियुक्ति हुई, उसी को जांच का प्रभारी बना दिया गया। इससे जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यह कदम केवल लीपापोती और साक्ष्य मिटाने के लिए उठाया गया है।

पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी संदिग्ध

गौरतलब है कि योजना अधिकारी अखिलेश मिश्रा पहले भी अतिशेष शिक्षक स्थानांतरण और उच्च पद प्रभार मामलों में विवादों में रह चुके हैं। इसके बावजूद उन्हें विभागीय जांचों से बचाते हुए जिम्मेदार पदों पर बनाए रखना, उच्च स्तर की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

 

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