भवन जर्जर, भविष्य खतरे में: मछेरा स्कूल के बच्चे बरामदे में बैठने को मजबूर

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रेवांचल टाइम्स ​छिंदवाड़ा
एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मंशा है कि प्रदेश का हर बच्चा सर्वसुविधायुक्त और सुरक्षित स्कूल भवन में शिक्षा ग्रहण करे, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन की अनदेखी इन दावों की हवा निकाल रही है। जिले के शासकीय प्राथमिक शाला मछेरा की स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि यहाँ मासूमों की जान जोखिम में डालकर उन्हें पढ़ाया जा रहा है।
​खिड़कियां टूटी, छत से गिरता प्लास्टर
​स्कूल की इमारत वर्तमान में पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। कमरों के भीतर बैठना किसी खतरे से कम नहीं है, जिसके कारण शिक्षक बच्चों को बरामदे में बिठाकर पढ़ाने को मजबूर हैं। ठंड हो या बारिश, मासूमों को खुले बरामदे में ही शिक्षा लेनी पड़ रही है। विडंबना देखिए कि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में सुरक्षित भविष्य की कलम होनी चाहिए, वहां उनके सिर पर जर्जर छत गिरने का साया मंडरा रहा है।
​बूंद-बूंद पानी को तरसते मासूम
​भवन की बदहाली के साथ-साथ यहाँ मूलभूत सुविधाओं का भी अकाल है। स्कूल में पीने के पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। छोटे-छोटे बच्चों को प्यास बुझाने के लिए स्कूल परिसर से बाहर जाना पड़ता है या अपने घरों से पानी ढोना पड़ता है। ‘स्वच्छ भारत’ और ‘नल जल योजना’ जैसे भारी-भरकम नारे इस स्कूल की दहलीज पर आकर दम तोड़ देते हैं।
​क्या अधिकारियों के पास समय का अभाव है?
​स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया है, लेकिन आज तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी स्कूल का निरीक्षण करने नहीं पहुँचा। ग्रामीणों ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा “क्या साहब लोगों के पास इतना भी समय नहीं कि वे इन गरीब बच्चों की सुध ले सकें? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?”
​”मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में शिक्षा सबसे ऊपर है, लेकिन छिंदवाड़ा के जमीनी हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं। अगर समय रहते भवन की मरम्मत या नए निर्माण की स्वीकृति नहीं मिली, तो मछेरा के बच्चों का भविष्य अंधेरे में डूब जाएगा।”

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