बाल अधिकारों पर सीधा हमला: खेल मैदान छीना गया, कलेक्टर की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल नगर पालिका की मनमानी पर प्रशासन मौन, कलेक्ट्रेट कॉलोनी के बच्चे सड़कों पर खेलने को मजबूर

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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिले में नगर पालिका परिषद मंडला की अनदेखी और तानाशाही चरम पार कर चुकी है, जहाँ अपने स्वर्थो के चलते किसी भी हद तक जा रही है चाहें कितनी भी शिकवा शिकायत कर ले कोई फर्क नही पडने वाला और संविधान और बाल अधिकार संरक्षण कानून बच्चों को सुरक्षित वातावरण, खेल और स्वस्थ विकास का अधिकार देता है। लेकिन मंडला में यही अधिकार खुलेआम कुचले जा रहे हैं। कलेक्ट्रेट कॉलोनी का सार्वजनिक खेल मैदान नगर पालिका परिषद द्वारा किराये पर दे दिया गया, और यह सब जिला प्रशासन की जानकारी और नियंत्रण के बावजूद होता रहा। यह मामला अब केवल नगर पालिका की तानाशाही नहीं, बल्कि बाल अधिकारों के उल्लंघन और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुका है।

बच्चे खेल रहे सड़को पर

जब बच्चों के खेल मैदान में संरक्षित की जगह किराये पर दे दिए जा तो बच्चे सड़को में खेल को मजबूर है और कभी कोई इनके साथ अनहोनी घट सकती है जिसका जिम्मेदार कौन होगा जहाँ खेल मैदान बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य होते हैं। मैदान छिन जाने के बाद कॉलोनी के मासूम बच्चे सड़कों और गलियों में खेलने को मजबूर हैं, जहां हर पल दुर्घटना का खतरा बना रहता है। यह स्थिति सीधे तौर पर बाल अधिकारों के संरक्षण में प्रशासन की असफलता को दर्शाती है।
स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों द्वारा नगर पालिका, एसडीएम और जिला प्रशासन को लिखित और मौखिक शिकायतें दी गईं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महीनों बाद भी न तो मैदान खाली कराया गया और न ही जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई हुई। यह चुप्पी अब सामान्य उदासीनता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है।

जिला प्रशासन और जिम्मेदार कार्यवाही करने से क्यों कतरा रहें हैं

जिला कलेक्टर, जो जिले में बाल संरक्षण, कानून-व्यवस्था और सभी विभागों के समन्वय के लिए सर्वोच्च उत्तरदायी अधिकारी होते हैं, उनकी भूमिका इस मामले में सवालों के घेरे में है। जब बच्चों के अधिकारों का खुला उल्लंघन हो रहा है, तो कलेक्टर स्तर से त्वरित हस्तक्षेप क्यों नहीं किया गया?

बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम केवल कागजो तक ही सीमित

वही शासन के बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम और शासन के दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि बच्चों के लिए उपलब्ध सार्वजनिक सुविधाओं को सुरक्षित रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद नगर पालिका की मनमानी पर कोई रोक नहीं लगना यह संकेत देता है कि या तो प्रशासनिक तंत्र निष्क्रिय हो चुका है या फिर मौन सहमति से यह खेल चल रहा है।

बाल अधिकार बनाम प्रशासन

कलेक्ट्रेट कॉलोनी के खेल मैदान का किराये पर दिया जाना बच्चों के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। इस मामले में नगर पालिका की तानाशाही, एसडीएम की निष्क्रियता और कलेक्टर की चुप्पी ने प्रशासनिक जवाबदेही को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यदि जिला प्रशासन ने शीघ्र हस्तक्षेप कर मैदान को बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं किया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं की, तो यह स्पष्ट माना जाएगा कि बाल अधिकार कागजों तक सीमित हैं। अब जरूरत है कि कलेक्टर स्वयं संज्ञान लेकर बच्चों के हित में तत्काल कार्रवाई करें — वरना यह मामला बाल अधिकार आयोग और उच्च स्तर तक जाना तय है।
इनका कहना है कि
जैसे ही कलेक्ट्रेट कालोनी में स्थित खेल मैदान में अतिक्रमण वाली जानकारी संज्ञान में आई तो मैने तत्काल ही नगर पालिका परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी मंडला को बोल दिया था पर आज तक उनके द्वारा कोई कार्यवाही क्यो नही की है आज पुनः बोल देती हूं।
सोनल सिडाम
एस डी एम मंडला
वही जब इस संबंध में मुख्य नगर पालिका अधिकारी गजानन नागफड़े से उनका पक्ष जानना चाहा तो अधिकारी द्वारा फोन नही रिसीव किया गया । इसलिए उनका पक्ष नही रखा जा सका।

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