ये कैसी माँ भक्ति और सेवा जहाँ कड़कड़ाती ठंड में माँ नर्मदा के तट पर बेसहारा जीवन, महिष्मति घाट की आरती और खाली पड़ी ‘माई की रसोई’ पर बड़ा सवाल

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रेवांचल टाइम्स, मंडला। एक ओर जहाँ महिष्मति घाट पर माँ नर्मदा की भव्य आरती, दीपों की रोशनी, में राज्यपाल से लेकर मंत्री, विधायक, तक शिरकत करते है और दूसरी तरफ इस आरती में रोजना ही इस आरती में जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी सहित आमजनमानस पहुँच रहें है…
तो दूसरी ओर उसी माँ नर्मदा के तट पर खुले आसमान के नीचे कड़कड़ाती ठंड में बेसहारा खुले आसमान के नीचे सड़क और नदी के तट के किनारे ही रात काटने को मजबूर वृद्ध, असहाय और भिक्षुक।

 

मंडला नगर में प्रतिदिन महिष्मति घाट और रेवा सेवा घाट में माँ नर्मदा की आरती का आयोजन हो रहा है, जिसमें शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधि समाजसेवी जनमानस बड़े उत्साह से भाग ले रहे हैं। माई की श्रद्धा और भक्ति के साथ आरती तो हो रहा है, लेकिन माँ नर्मदा के आंचल में पल रहे मानव दुःख पर किसी की नज़र नहीं पड़ रही। आख़िर क्यों

श्रद्धा मंच पर, सेवा गायब

महिष्मति घाट और आसपास के क्षेत्रों में कई वृद्धजन, बेसहारा पुरुष-महिलाएं और भिक्षुक सड़कों के किनारे या सीधे नर्मदा तट पर ठिठुरती रातें बिताने को मजबूर हैं। न कंबल, न आश्रय, न गर्म भोजन की कोई व्यवस्था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि माँ नर्मदा तट पर ही बनी ‘माई की रसोई’ पूरी तरह बंद पड़ी है।
जिसमे छत मौजूद है, रसोई मौजूद है, लेकिन ताले लटके हुए हैं। जब लोग ठंड और भूख से जूझ रहे हैं, तब यह रसोई किस दिन के लिए सहेज कर रखी गई है—यह बड़ा प्रश्न बन गया है।
क्या यही भक्ति और सेवा है?
जब हर शाम आरती में शामिल होने के लिए प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाजसेवी पहुँच सकते हैं, तो क्या उसी समय इन असहाय लोगों के लिए:
कंबल वितरण अस्थायी रैन बसेरे माई की रसोई का संचालन वृद्ध आश्रम जैसे छोटे-छोटे कदम नहीं उठाए जा सकते?
यदि नहीं, तो यह भक्ति नहीं बल्कि दिखावटी श्रद्धा कहलाएगी।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सवाल
ठंड में मरने की कगार पर बैठे वृद्धों की जिम्मेदारी किसकी है?
माई की रसोई में आखिर ताला बंद क्यों है?
क्या माँ नर्मदा की सच्ची सेवा केवल मंचों और फोटो तक सीमित रह गई है?
यह खबर किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता पर एक करारा तमाचा है।
माँ नर्मदा की आरती तभी सार्थक होगी, जब उनके तट पर बैठे अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचेगी।
अन्यथा यह जनहित नहीं, बल्कि जनता के मुंह पर मारा गया एक कठोर सच है।

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