गेहूं बर्बाद करने वालों को मिला अभयदान
अभी तक नहीं हुई सही जांच पड़ताल, बर्बाद हो गया 50 करोड़ का गेहूं
रेवाँचल टाईम्स- मंडला। मध्यप्रदेश के मंडला जिले में सरकारी गोदामों में सड़ते गेहूं का मामला अब एक राष्ट्रीय शर्म का विषय बन चुका है। 8 जनवरी 2026 को प्रकाशित समाचार में खुलासा हुआ कि अफसरों की घोर लापरवाही से करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य का गेहूं खराब हो गया। यह सिर्फ अनाज की बर्बादी नहीं, बल्कि गरीबों के मुंह से छीना गया निवाला है, जो अब कीड़ों और सड़न की भेंट चढ़ चुका है। लेकिन अफसोस, जिला प्रशासन की प्रतिक्रिया उतनी ही सुस्त और चुनिंदा है—केवल नैनपुर के एक गोदाम की जांच का आदेश, वह भी सोशल मीडिया की जानकारी के आधार पर। क्या बाकी गोदामों को अभयदान’ मिल गया है? यह सवाल हर जिम्मेदार नागरिक के मन में कौंध रहा है।
तथ्य स्पष्ट हैं: जिला प्रबंधक हेमंत वर्मा ने खुद गोदामों की लिस्ट बनाकर स्वीकार किया कि कई जगहों पर गेहूं खराब हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि गोदाम प्रभारियों को अपनी जेब से साफ-सफाई करानी होगी और शासन को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन शाखा प्रबंधक श्रीकांत जैन का जवाब इससे उलट है—’मैं इतना पैसा कहां से लाऊं?’ उन्होंने साफ कहा कि व्यय शासन से ही आएगा। यह विरोधाभास जांच की मांग करता है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। क्या यह भ्रष्टाचार की जड़ें छिपाने की कोशिश है? मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में, जहां गरीबी और भुखमरी पहले से ही समस्या है, ऐसे घोटाले न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर जनता का विश्वास भी तोड़ते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित अपराध जैसा लगता है। सरकारी तंत्र के संरक्षण में चल रही इन गड़बड़ियों की जड़ें ऊपर तक जाती हैं। अगर जिला प्रशासन के मुखिया ने पूरे जिले में जांच के आदेश नहीं दिए, तो क्या यह दोषियों को बचाने की साजिश है? नागरिकों की मांग जायज है—खराब गेहूं की पूरी रकम दोषियों से वसूली जाए, इसे किसी भी हाल में वितरित न किया जाए, और सभी गोदामों व उचित मूल्य दुकानों की विशेष जांच हो। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह साबित होगा कि शासन गरीबों की बजाय अफसरों की रक्षा में ज्यादा रुचि रखता है।
मंडला। मध्यप्रदेश के मंडला जिले में सरकारी गोदामों में सड़ते गेहूं का मामला अब एक राष्ट्रीय शर्म का विषय बन चुका है। 8 जनवरी 2026 को प्रकाशित समाचार में खुलासा हुआ कि अफसरों की घोर लापरवाही से करीब 50 करोड़ रुपये मूल्य का गेहूं खराब हो गया। यह सिर्फ अनाज की बर्बादी नहीं, बल्कि गरीबों के मुंह से छीना गया निवाला है, जो अब कीड़ों और सड़न की भेंट चढ़ चुका है। लेकिन अफसोस, जिला प्रशासन की प्रतिक्रिया उतनी ही सुस्त और चुनिंदा है—केवल नैनपुर के एक गोदाम की जांच का आदेश, वह भी सोशल मीडिया की जानकारी के आधार पर। क्या बाकी गोदामों को अभयदान’ मिल गया है? यह सवाल हर जिम्मेदार नागरिक के मन में कौंध रहा है।
तथ्य स्पष्ट हैं: जिला प्रबंधक हेमंत वर्मा ने खुद गोदामों की लिस्ट बनाकर स्वीकार किया कि कई जगहों पर गेहूं खराब हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि गोदाम प्रभारियों को अपनी जेब से साफ-सफाई करानी होगी और शासन को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन शाखा प्रबंधक श्रीकांत जैन का जवाब इससे उलट है—’मैं इतना पैसा कहां से लाऊं?’ उन्होंने साफ कहा कि व्यय शासन से ही आएगा। यह विरोधाभास जांच की मांग करता है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। क्या यह भ्रष्टाचार की जड़ें छिपाने की कोशिश है? मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में, जहां गरीबी और भुखमरी पहले से ही समस्या है, ऐसे घोटाले न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर जनता का विश्वास भी तोड़ते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित अपराध जैसा लगता है। सरकारी तंत्र के संरक्षण में चल रही इन गड़बड़ियों की जड़ें ऊपर तक जाती हैं। अगर जिला प्रशासन के मुखिया ने पूरे जिले में जांच के आदेश नहीं दिए, तो क्या यह दोषियों को बचाने की साजिश है? नागरिकों की मांग जायज है—खराब गेहूं की पूरी रकम दोषियों से वसूली जाए, इसे किसी भी हाल में वितरित न किया जाए, और सभी गोदामों व उचित मूल्य दुकानों की विशेष जांच हो। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह साबित होगा कि शासन गरीबों की बजाय अफसरों की रक्षा में ज्यादा रुचि रखता है।