महिला नसबंदी शिविर बना जोखिम का सफर,* *सिविल अस्पताल नैनपुर में नियमों की खुलेआम अनदेखी

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रेवांचल टाइम्स नैनपुर मंडला|सरकार भले ही महिला स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन सिविल अस्पताल नैनपुर में आयोजित महिला नसबंदी शिविर इन दावों की पोल खोलते नजर आ रहे हैं। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि नसबंदी ऑपरेशन के बाद महिला हितग्राहियों को अस्पताल प्रशासन द्वारा सुरक्षित वाहन से घर तक छोड़ा जाए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
आदिवासी महिलाओं की जान से खिलवाड़
यूं तो शासन और स्थानीय राजनैतिक दल आदिवासी हित में बात करते और संपूर्ण सुशासन के नाम पर छाती पीटते नजर आ जाते है किंतु मैदानी स्थिति इसके ठीक उलट है,सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार वर्तमान घटना सिविल अस्पताल नैनपुर में आयोजित हो रहे महिला नसबंदी शिविर की है,नियमानुसार शासन हितग्राहित महिलाओं को अस्पताल आने एवं ऑपरेशन के बाद सुरक्षित घर तक छोड़ने का दावा करता है परन्तु अस्पताल की ओर से कोई वाहन उपलब्ध नहीं कराया जाता। मजबूरन महिला हितग्राही निजी वाहनों से अपने घर जाती हैं। हालात यह हैं कि एक ही निजी वाहन में 5–6 ऑपरेशन कराई हुई महिलाएं, उनके साथ आए परिजन मिलाकर 9–10 लोगों को ठूंस-ठूंस कर बैठाया जाता है।
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब ऑपरेशन के बाद कई महिलाएं बेहोशी या अर्धबेहोशी की अवस्था में होती हैं। चिकित्सा नियमों के अनुसार, इस दौरान महिलाओं को आरामदायक और सुरक्षित परिवहन की आवश्यकता होती है, लेकिन यहां उन्हें झटकों और भीड़भाड़ वाले वाहनों में भेज दिया जाता है। ऐसे में टांके खुलने, अत्यधिक रक्तस्राव या अन्य गंभीर जटिलताओं की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह सीधे-सीधे महिला जीवन से खिलवाड़ जैसा प्रतीत होता है।
*शासन की नैया डुबाने पर उतारू स्वास्थ्य विभाग और सीएमएचओ*
जब इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, मंडला से सवाल किया गया तो उन्होंने कोई ठोस जवाब देने के बजाय गोलमटोल बातें कीं और बातचीत के दौरान फोन काट दिया। यह रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जिम्मेदार अधिकारी इस अव्यवस्था पर जवाब देने से बच रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ऑपरेशन के बाद किसी महिला के साथ कोई अनहोनी होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। क्या नियम सिर्फ फाइलों में लागू किए गए हैं? क्या महिला स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाएं सिर्फ आंकड़े पूरे करने तक सीमित रह गई हैं?
*घर में बच्चे भूखे, लेकिन मजबूरी है खुद के खर्च से नसबंदी के लिए आना*
हितग्राही से बात करने पर एक हितग्राही ने पहचान गुप्त करने की शर्त में बताया कि मजदूरी करके बच्चों का पालन पोषण करती है, स्थानीय आशा कार्यकर्ता ने उसे बोला कि अगर खुद के पैसे खर्च नहीं करोगी तो नसबंदी नहीं हो पाएगी, और शासन से मिलने वाली योजना का लाभ भी नहीं मिलेगा, मजबूरन 500 रुपए कर्ज ले कर आए है घर में बच्चे भूखे है, शासन से निवेदन है या तो निःशुल्क व्यवस्था बनाए या जब तक शासन के पास व्यवस्था नहीं बन रही है ऐसे शिविर आयोजित न करे जिससे गरीब को कर्ज लेना पड़े या बच्चों को भूखे रखना पड़े।

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