नसबंदी शिविर में लापरवाही: इंजेक्शन लगाने के बाद महिलाओं को बैरंग लौटाया, चार बेहोशी की हालत में पड़ी रहीं

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नसबंदी कराने आई महिलाओं को इंजेक्शन लगाने के बाद शिविर से बैरंग लौटाया

लगभग अस्सी महिलाओं का हुआ पंजीकरण तीन दर्जन को वापस लौटाया

बजाग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में गंभीर लापरवाही के आरोप

नहीं हुई नसबंदी ,चार महिलाएं बेहोशी की हालत में बरामदे में पड़ी रही

दैनिक रेवाँचल टाईम्स बजाग – सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बजाग में आयोजित नसबंदी शिविर के दौरान भारी अव्यवस्था सामने आई, जिससे करीब 30 से 35 महिलाओं को बिना ऑपरेशन कराए ही बैरंग लौटना पड़ा। दूर-दराज के गांवों से आई महिलाओं ने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं।
महिलाओं का कहना है कि उन्हें आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से नसबंदी के लिए बुलाया गया था। सुबह करीब आठ बजे से महिलाएं अस्पताल में मौजूद रहीं और छह से सात घंटे तक भूखी-प्यासी अपनी बारी का इंतजार करती रहीं। इस दौरान उनका रजिस्ट्रेशन किया गया, माथे पर नंबरिंग की पर्ची चिपकाई गई और ऑपरेशन की तैयारी के तहत इंजेक्शन व दवाइयां भी दी गईं। आरोप है कि कुछ महिलाओं को बेहोशी का इंजेक्शन तक लगा दिया गया, लेकिन शाम के समय “कोटा फुल” होने का हवाला देकर उन्हें वापस भेज दिया गया।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब चार महिलाओं को बेहोशी की हालत में ही ऑपरेशन से मना कर दिया गया। परिजनों के अनुसार, बेहोश महिलाएं घंटों अस्पताल के बरामदे में पड़ी रहीं और उनके छोटे बच्चे परिजन गोद में लेकर परेशान होते रहे।


बिनझोरी पंचगांव निवासी मोना बाई (पति गोविंद) और रामबाई (पति अशोक) के परिजनों ने बताया कि दोनों महिलाओं को नसबंदी के लिए पूरी तरह चिन्हित कर लिया गया था। सिर पर पर्ची लगाई गई और दो से चार प्रकार के इंजेक्शन दिए गए, जिनमें बेहोशी का इंजेक्शन भी शामिल था। जब ऑपरेशन की बारी आई तो साफ मना कर दिया गया। मोना बाई की पांच माह की बच्ची को घर की बुजुर्ग महिला किसी तरह संभालती रही, जबकि परिजन साधन के अभाव में परेशान होते रहे।
इसी तरह बिनझोरी निवासी प्रियंका गवले व बरसोद की शिवबाला बाई ने बताया कि उन्हें पूरी तरह तैयार करने के बाद अचानक वापस जाने को कह दिया गया। महिलाओं का आरोप है कि लगभग 80 महिलाओं का रजिस्ट्रेशन किया गया, लेकिन उनमें से करीब 35 महिलाओं को ऑपरेशन से मना कर दिया गया।
शाम होते-होते महिलाएं अस्पताल परिसर और आसपास भटकती नजर आईं। कुछ निजी साधनों से आई थीं तो कुछ बस से, लेकिन ऑपरेशन न होने के बाद लौटने के लिए साधन तक नहीं मिल पाया।
इस पूरे मामले पर बीएमओ चंद्रशेखर धुर्वे का कहना है कि शिविर में महिलाओं की संख्या अपेक्षा से अधिक आ गई थी। शासन की गाइडलाइन के अनुसार एक शिविर में 50 से अधिक नसबंदी ऑपरेशन नहीं किए जा सकते। एक ही सर्जन उपलब्ध था, जिसने तय सीमा से अधिक ऑपरेशन करने से मना कर दिया।
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब 50 से अधिक नसबंदी नहीं की जानी थी, तो अतिरिक्त महिलाओं को घंटों तक क्यों रोका गया? उनका रजिस्ट्रेशन कर, इंजेक्शन देकर, यहां तक कि कुछ को बेहोश करने के बाद नियमों का हवाला देकर ऑपरेशन से मना क्यों किया गया? यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है और मामले की जांच की मांग की जा रही है।

इनका कहना है गाइडलाइन के अनुसार एक शिविर में पचास से ज्यादा लोगों की नसबंदी नहीं की जा सकती।जरूरत से ज्यादा महिलाएं आ गई थी जिन्हें दोपहर में ही मना कर दिया गया था
चंद्रशेखर धुर्वे बीएमओ बजाग डिंडोरी

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