माँ नर्मदा गौ महाकुंभ परिसर में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भव्य रूप से संपन्न
गौ संरक्षण, विकास और करुणा पर वैश्विक विमर्श के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बढ़ाया आयोजन का गौरव
छिंदवाड़ा रेवांचल टाइम्स सूर्यकांत भट्ट|माँ नर्मदा गौ महाकुंभ 2026 के अंतर्गत *“गौ संरक्षण, विकास एवं करुणा”* विषय पर महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो आलोक चौबे जी के मार्गदर्शन में दिनांक 18 एवं 19 जनवरी को एक भव्य दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। यह सम्मेलन हाइब्रिड मोड में संपन्न हुआ, जिसमें 18 जनवरी को माँ नर्मदा गौ महाकुंभ परिसर में ऑफलाइन सत्र आयोजित किए गए, जबकि 19 जनवरी को देश-विदेश के विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं विशेषज्ञों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। इस सम्मेलन ने आध्यात्मिक चेतना, अकादमिक विमर्श और सामाजिक सरोकारों का एक सशक्त समन्वय प्रस्तुत किया।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य गौ माता के संरक्षण, गौ-आधारित ग्रामीण विकास, करुणा-केंद्रित सामाजिक व्यवस्था तथा भारतीय सांस्कृतिक एवं ज्ञान परंपराओं को वैश्विक विमर्श से जोड़ना रहा। वक्ताओं ने एक स्वर में यह प्रतिपादित किया कि गौ केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सतत कृषि, ग्रामीण आजीविका और मानवीय मूल्यों की आधारशिला है।
सम्मेलन का कुशल समन्वय **डॉ. दिग्विजय सिंह** द्वारा किया गया। उनके नेतृत्व में सभी तकनीकी सत्र, शोधपत्र प्रस्तुतिकरण और संवाद सत्र सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुए। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने माँ नर्मदा गौ महाकुंभ को एक आध्यात्मिक, सामाजिक और बौद्धिक आंदोलन बताते हुए इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर प्रकाश डाला।
सम्मेलन में **साध्वी श्यामा दीदी** की गरिमामयी उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। अपने प्रेरक संबोधन में उन्होंने कहा कि गौ सेवा करुणा, अहिंसा और भारतीय जीवन दर्शन की आत्मा है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे गौ संरक्षण को केवल परंपरा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता के रूप में स्वीकार करें।
**जनमेजय सिंह** ने अपने विचार रखते हुए कहा कि गौ-आधारित विकास मॉडल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक सशक्त माध्यम बन सकता है। उन्होंने नीति निर्माण, सामाजिक सहभागिता और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं *प्रो. देवेंद्र प्रसाद पांडेय** ने अकादमिक दृष्टिकोण से गौ संरक्षण से जुड़े अनुसंधानों की वैज्ञानिक, प्रबंधन एवं नीति-आधारित महत्ता को रेखांकित किया और विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थानों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
सम्मेलन की प्रमुख विशेषता देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत किए गए शोधपत्र रहे। भारत के अनेक राज्यों के साथ-साथ विदेशों से जुड़े विद्वानों ने ऑनलाइन माध्यम से अपने शोध प्रस्तुत किए। इन शोधपत्रों में गौ संरक्षण, पशुपालन, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, पंचगव्य अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण उद्यमिता, स्वास्थ्य, आयुर्वेद, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक जीवन मूल्य और सतत विकास जैसे विषयों पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया।
शोधपत्र प्रस्तुतिकरण सत्रों के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि गौ-आधारित मॉडल केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पर्यावरणीय संकट, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असंतुलन के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कई विदेशी प्रतिभागियों ने भारतीय गौ-संस्कृति को विश्व के लिए अनुकरणीय बताते हुए इसे करुणा-आधारित विकास का प्रभावी मॉडल माना।
**अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।** जवाहर नवोदय विद्यालय बोहानी, शासकीय हाई स्कूल छीतापार सहित विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने नृत्य, भजन एवं अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। विद्यार्थियों की इन मनोहारी प्रस्तुतियों ने न केवल भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवंत किया, बल्कि गौ माता के प्रति श्रद्धा, भक्ति और संवेदनशीलता को भी प्रभावी रूप से अभिव्यक्त किया। उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों ने इन प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया।
सम्मेलन के दौरान प्रश्न-उत्तर एवं विचार-विमर्श सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें प्रतिभागियों ने वक्ताओं से सीधे संवाद किया। इन सत्रों में नीति निर्माण, व्यवहारिक क्रियान्वयन, तकनीक के उपयोग, युवाओं की भूमिका और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर गंभीर एवं सार्थक चर्चा हुई।
समापन सत्र में आयोजकों ने सभी वक्ताओं, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ देने वाले विद्यार्थियों तथा सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय विमर्श और सांस्कृतिक सहभागिता से माँ नर्मदा गौ महाकुंभ 2026 का उद्देश्य और अधिक सशक्त होगा तथा गौ संरक्षण, विकास और करुणा का संदेश समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचेगा।
कुल मिलाकर, यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक अकादमिक आयोजन न रहकर एक समग्र वैचारिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरा, जिसमें भारतीय परंपरा, आधुनिक विज्ञान, युवा सहभागिता और वैश्विक दृष्टिकोण का सुंदर समन्वय देखने को मिला।