जनहित का मार्ग कांटों भरा, पर संकल्प अडिग
*समाजसेवी रिंकू रितेश चौरसिया ने साझा किए समाज सेवा के कड़वे और प्रेरक अनुभव*
*परोपकार केवल तालियों की गड़गड़ाहट नहीं, बल्कि व्यक्तिगत बलिदान और अस्तित्व के संघर्ष का नाम है: रिंकू रितेश चौरसिया*
*रेवांचल टाइम्स छिंदवाड़ा*
विगत 16 वर्षों से मानवता की सेवा में समर्पित और हज़ारों यूनिट रक्तदान का संकल्प निभाने वाले जिले के प्रखर समाजसेवी रिंकू रितेश चौरसिया ने हाल ही में समाज सेवा के उस ‘अदृश्य संघर्ष’ पर अपने गहन अनुभव साझा किए, जिसे अक्सर लोग देख नहीं पाते। एक भावुक संबोधन में उन्होंने बताया कि नि:स्वार्थ जनसेवा का मार्ग जितना गौरवमयी है, उतना ही यह व्यक्तिगत जीवन के लिए चुनौतीपूर्ण भी है।
चौरसिया ने समाज सेवा के चार प्रमुख कड़वे सच और संघर्षों को रेखांकित किया
*1. अपनों के बीच रहकर भी पराया होना (पारिवारिक विच्छेद):*
उन्होंने बताया कि एक सक्रिय समाजसेवी अक्सर अपने ही परिवार के लिए ‘अनुपस्थित’ हो जाता है। जब समाज की समस्याओं के लिए वह सड़कों पर संघर्ष कर रहा होता है, तब वह बच्चों की शिक्षा और घर के महत्वपूर्ण पलों को खो देता है। परिवार को समय न दे पाने का अपराधबोध एक समाजसेवी को भीतर ही भीतर तोड़ता है।
*2. आर्थिक पतन और अभावों का जीवन:*
जनसेवा का मार्ग वित्तीय अस्थिरता से भरा है। जब कोई व्यक्ति अपने निजी व्यवसाय को गौण मानकर समाज के लिए निकलता है, तो आय के स्रोत प्रभावित होते हैं। जनहित के कार्यों में अक्सर अपनी निजी जमापूंजी लगानी पड़ती है, जिससे परिवार के जीवन स्तर पर भी गहरा असर पड़ता है।
*3. मौत के साये में जीने की मजबूरी (सुरक्षा का संकट):*
सच्चाई और न्याय की आवाज उठाना अक्सर भ्रष्ट लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है। रिंकू चौरसिया ने स्वीकार किया कि इस मार्ग पर जान से मारने की धमकियों और झूठे मुकदमों का जोखिम हमेशा बना रहता है। अपनी और परिवार की सुरक्षा का डर एक निरंतर मनोवैज्ञानिक तनाव पैदा करता है।
*4. चापलूसी बनाम जनसरोकार:*
समाज की विडंबना पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता की जी-हुज़ूरी करना आसान है, लेकिन जनता के अधिकारों के लिए खड़ा होने हेतु अदम्य साहस और रीढ़ की हड्डी मजबूत होनी चाहिए। चापलूसी से तात्कालिक लाभ मिल सकता है, लेकिन समाज का नैतिक पतन होता है।
*प्रेरणा और समाधान का संदेश:*
इन भीषण बाधाओं के बावजूद रिंकू चौरसिया ने डटे रहने का मंत्र भी दिया। उन्होंने कहा कि:
मानसिक सुदृढ़ता: विपरीत परिस्थितियों में ध्यान और आत्म-चिंतन का सहारा लें।
सामुदायिक जुड़ाव: अकेले लड़ने के बजाय समान विचारधारा वाले लोगों को साथ जोड़ें।
पारदर्शिता: अपने कार्यों और आर्थिक व्यवहार में पारदर्शिता रखें ताकि विरोधी उंगली न उठा सकें।
चौरसिया ने अंत में कहा, “इतिहास गवाह है कि समाज उन्हीं का ऋणी रहता है जिन्होंने झुकने के बजाय जूझना चुना। जनहित की पुकार व्यवस्था को जवाबदेह बनाती है। स्वाभिमान के साथ जीना और सत्य के पथ पर अडिग रहना ही मनुष्य की असली उपलब्धि है।”
प्रमुख बिंदु :
16 वर्षों का अटूट संघर्ष: मानव सेवा, गौ सेवा, बेटी बचाओ और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित।
हजारों यूनिट रक्तदान का रिकॉर्ड: 2100 यूनिट से अधिक रक्तदान का सफल समन्वय।
सामाजिक सरोकार: गरीबों को कंबल वितरण और हजारों पौधों का रोपण। कोरोना महामारी में 59 दिन 1200 निराश्रितों का प्रतिदिन का भोजन करवाना दूसरी लहर में लाखों मरीजों को अपने घरेलू थेरेपी बनाकर उपचार देना। आए समय जनहित के मुद्दों पर अपनी आवाज को बुलंद करना। 24 घंटे जिले में दुर्घटनाग्रस्त गौ माताओं का उपचार एवं सेवा