मौत के खंभे पर मजदूर की बलि

बिजली विभाग के रसूखदार हत्यारों का पर्दाफाश, रातों-रात लाश जलाकर इंसाफ का कत्ल

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दैनिक रेवांचल टाईम्स – सिवनी केवलारी/धनौराधनौरा–केवलारी के बीच ग्राम खरसाडू में जो हुआ, वह कोई हादसा नहीं—यह सिस्टम प्रायोजित हत्या की कहानी है। मध्यप्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के अंतर्गत चल रहे बिजली विस्तार कार्य में एक गरीब मजदूर को बिना शटडाउन, बिना सुरक्षा किट और बिना किसी वैधानिक अनुमति हाई वोल्टेज लाइन पर चढ़ा दिया गया। नतीजा—मजदूर की मौके पर मौत।
चश्मदीदों के मुताबिक मजदूर करंट की चपेट में आने के बाद चीखता-तड़पता रहा, लेकिन ठेकेदार ने काम नहीं रुकवाया। यह लापरवाही नहीं, सीधी आपराधिक लापरवाही से आगे बढ़कर हत्या का मामला बनता है।
सबूत मिटाने की साजिश?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि मौत के बाद शव का रातों-रात अंतिम संस्कार क्यों किया गया?
पोस्टमार्टम से डर था?
पुलिस जांच से बचने की कोशिश?
या फिर पीड़ित परिवार को दबाव/पैसे देकर चुप करा दिया गया?
अगर मौत “दुर्घटना” थी, तो पोस्टमार्टम क्यों नहीं?
अगर सब कुछ वैध था, तो FIR क्यों नहीं?
कागजों पर जिंदा, हकीकत में लावारिस
मृत मजदूर के पास—
लेबर कार्ड नहीं, बीमा नहीं, सुरक्षा उपकरण नहीं, यानी साफ है कि अवैध ठेकेदारी विभागीय अफसरों की नाक के नीचे चल रही थी। फाइलों में नियम चमकते हैं, लेकिन ज़मीन पर गरीब का चूल्हा बुझाया जा रहा है।
सवाल जो सिस्टम से टकराते हैं
धारा 302 (हत्या) और 201 (सबूत मिटाना) के तहत केस क्यों दर्ज नहीं?
ठेकेदार पर FIR कब होगी?
क्या बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर भी आपराधिक कार्रवाई होगी?
क्या यह सब बिना विभागीय मिलीभगत के संभव है?
क्या किसी साहब तक “कमीशन” पहुँच रहा था?
प्रशासन और सरकार से सीधे सवाल
कलेक्टर महोदय: क्या एक गरीब मजदूर की जान इतनी सस्ती है कि पोस्टमार्टम भी न हो?
ऊर्जा मंत्री: आपके विभाग के ठेकेदार कब से यमराज बन बैठे हैं?
पुलिस प्रशासन: रसूख के आगे कानून क्यों झुका?
जनता में आक्रोश
आज खरसाडू का हर घर डरा हुआ है। यह सिर्फ एक मौत नहीं—यह चेतावनी है उन अफसरों के लिए जो एसी कमरों में बैठकर फाइलें पास करते हैं।
याद रखिए, उस मजदूर के अनाथ बच्चों की आह किसी भी कुर्सी को हिला सकती है।
सोशल मीडिया के लिए विस्फोटक हेडलाइंस
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धनौरा-केवलारी में मौत का तांडव: क्या बिक चुका है सिस्टम?
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