
रेवांचल टाइम्स निवास मंडला|नगर की अंग्रेजी शराब दुकान इन दिनों खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने के आरोपों से घिरी है। दिन-दहाड़े मोटरसाइकिल से गांव-गांव शराब पहुंचाई जा रही है और ग्राहकों से अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से ज्यादा रकम वसूली जा रही है। हैरानी की बात यह है कि यह सब बिना किसी डर के, खुलेआम हो रहा है न स्थानीय पुलिस की परवाह, न आबकारी विभाग की चिंता।
रेट लिस्ट दिखावे की, अंदर अलग ही खेल
दुकान के बाहर बाकायदा रेट लिस्ट टंगी है, जिससे यह संदेश दिया जाता है कि सब कुछ नियमों के तहत चल रहा है। लेकिन ग्राहकों का आरोप है कि यह महज दिखावा है सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वास्तविकता यह है कि तय कीमत से 20 से 30 रुपये तक अधिक वसूले जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो यह अंतर और भी ज्यादा बताया जा रहा है।ग्राहकों का कहना है कि यदि कोई तय रेट की बात करता है तो उसे टाल दिया जाता है या अगली बार शराब न देने की धमकी तक दे दी जाती है। मजबूरी में लोग ज्यादा पैसे देकर शराब खरीदने को विवश हैं। सवाल यह है कि जब एमआरपी से अधिक वसूली कानूनन अपराध है, तो यह खेल आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है?
बाइक बनी अवैध सप्लाई की रीढ़
मोटरसाइकिल के जरिए हो रही सप्लाई को लेकर हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, दुकान से शराब की पेटियां बोरी में भरकर बाइक पर लादकर आसपास के गांवों बबलिया, पिपरिया, मोहगांव, बिछौली, बिसोरा, हाथीतारा, ग्वारा और भलवारा जैसे अन्य क्षेत्रों तक पहुंचाई जा रही हैं। यह सब किसी रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में हो रहा है।गांवों में यह शराब मनमाने दामों पर बेची जा रही है। न कोई बिल, न कोई हिसाब—सिर्फ नकद लेन-देन। इससे न केवल सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है, बल्कि अवैध बिक्री को भी बढ़ावा मिल रहा है। यदि यह सप्लाई अधिकृत है तो उसका रिकॉर्ड कहां है और यदि अनधिकृत है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं
पुलिस और आबकारी विभाग पर उठे सवाल
इतनी खुली गतिविधियों के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या पुलिस को दिन दहाड़े दौड़ती बाइकें नजर नहीं आ रही क्या आबकारी विभाग को ओवररेटिंग की शिकायतें नहीं मिलीं या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गई है स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि शिकायतें पहले भी की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह संदेह गहराता है कि कहीं न कहीं संरक्षण का खेल तो नहीं चल रहा। यदि ऐसा नहीं है तो फिर सख्ती क्यों नहीं दिखती गांवों में बढ़ती कच्ची अंग्रेजी शराब की उपलब्धता ने सामाजिक माहौल बिगाड़ दिया है। मजदूरी का पैसा शराब में उड़ रहा है, घरों में विवाद बढ़ रहे हैं और युवा पीढ़ी नशे की चपेट में आ रही है। कई ग्रामों में महिलाओं ने खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि गांव-गांव शराब पहुंचने से परिवार टूट रहे हैं और बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ रहा है।यदि इस पर तुरंत रोक नहीं लगी तो हालात और बिगड़ सकते हैं। शराब की आसान उपलब्धता अपराध दर बढ़ाने का कारण भी बन सकती है।
स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि दुकान के स्टॉक और बिक्री रजिस्टर की तत्काल जांच कराई जाए। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएं और यह देखा जाए कि कितनी शराब आधिकारिक रूप से बेची गई और कितनी बाहर भेजी गई। यदि एमआरपी से अधिक वसूली की पुष्टि होती है, कठोर कार्रवाई की जाए। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग कब जागते हैं और कानून का डंडा कब चलता है। फिलहाल तो हालात यही बयां कर रहे हैं कि यहां नियमों से ज्यादा ताकत पैसों की चल रही है।
इनका कहना
किसी को भेज कर शराब की खरीदी करवाई जाएगी अगर ज्यादा कीमत पर बेची जाती है तो कार्यवाही की जायेगी।
शैली सैयाम
आबकारी उप निरीक्षक