आदिवासी बाहुल्य मंडला में रिश्वतखोरी बेलगाम: एक और लिपिक लोकायुक्त के शिकंजे में

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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। आदिवासी बाहुल्य मंडला जिला इन दिनों विकास से ज्यादा भ्रष्टाचार, गबन और रिश्वतखोरी के मामलों को लेकर सुर्खियों में है। हालात यह हैं कि लोकायुक्त पुलिस जबलपुर और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की टीमों को लगातार जिले में कार्रवाई करनी पड़ रही है, और आंकड़ों के लिहाज से प्रदेश में रिश्वत लेते पकड़े जाने वाले अधिकारी-कर्मचारियों में मंडला का नाम बार-बार सामने आ रहा है। इसके बावजूद सरकारी दफ्तरों में बैठे जिम्मेदारों पर कोई असर दिखाई नहीं दे रहा।
ताजा मामला निवास एसडीएम कार्यालय का है, जहां दो दशक से जमे सहायक ग्रेड-3 लिपिक काशीराम मरावी को लोकायुक्त टीम ने 5 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों दबोच लिया। बताया गया कि जमीन के खसरे में नाम सुधार के लिए फरियादी से पहले 10 हजार रुपये की मांग की गई थी, बाद में 8 हजार रुपये में सौदा तय हुआ। बुधवार को जैसे ही लिपिक ने टेबल के नीचे रखी रिश्वत की रकम उठाई, पहले से तैनात टीम ने उसे धर दबोचा। कार्रवाई का नेतृत्व निरीक्षक जितेन्द्र यादव ने किया।
यह कोई पहला मामला नहीं है। जिले के अलग-अलग विभागों में पदस्थ अधिकारी-कर्मचारी लगातार रिश्वत लेते पकड़े जा रहे हैं, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या कार्रवाई का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है? ग्रामीण और आदिवासी अंचलों से आने वाले लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और बिना “नजराना” दिए फाइल आगे नहीं बढ़ती—यह धारणा अब आम होती जा रही है।
सबसे गंभीर बात यह है कि बार-बार हो रही इन कार्रवाइयों के बाद भी व्यवस्था में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा। न तो विभागीय स्तर पर सख्ती दिखती है और न ही लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों का स्थानांतरण होता है। नतीजतन भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी होती जा रही हैं।
जिले में लगातार हो रही लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की कार्रवाई यह तो साबित कर रही है कि शिकायतें सही हैं, लेकिन यह भी बड़ा सवाल है कि आखिर जिम्मेदार कब जागेंगे? क्या आदिवासी अंचल के भोले-भाले लोगों को इसी तरह शोषण का शिकार होना पड़ेगा या फिर प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस और स्थायी व्यवस्था बनाई जाएगी?
मंडला में उठती यह आवाज अब सिर्फ एक गिरफ्तारी की खबर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल बन चुकी है।

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