अतिथि शिक्षकों के समर्थन में उठी आवाज, एक सप्ताह अनुपस्थिति पर पोर्टल से हटाने के आदेश का विरोध

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रेवांचल टाइम्स मण्डला। मध्यप्रदेश के शासकीय विद्यालयों में कार्यरत अतिथि शिक्षकों को लेकर लोकशिक्षण संचालनालय द्वारा 20 फरवरी को जारी आदेश के बाद अतिथि शिक्षकों में असंतोष की स्थिति निर्मित हो गई है। आदेश के अनुसार यदि कोई अतिथि शिक्षक एक सप्ताह से अधिक समय तक अनुपस्थित रहता है तो उसे पोर्टल से रिलीव कर दिया जाएगा। इस निर्णय को अतिथि शिक्षक संगठनों ने अव्यवहारिक और अमानवीय बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है।
जिला मुख्यालय मण्डला में चर्चा के दौरान अतिथि शिक्षक समन्वय समिति के जिला अध्यक्ष एवं संस्थापक पी.डी. खैरवार ने इस आदेश की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अतिथि शिक्षक वर्षों से शासकीय विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, बावजूद इसके उन्हें अस्थायी कर्मचारी की तरह देखा जाता है। सरकार का यह नया आदेश उनकी सेवा सुरक्षा पर सीधा प्रहार है।
खैरवार ने कहा कि अतिथि शिक्षक भी आम नागरिकों की तरह इंसान हैं, मशीन नहीं। वे भी बीमार पड़ सकते हैं, पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं और आकस्मिक परिस्थितियों का सामना करते हैं। यदि किसी शिक्षक के साथ दुर्घटना हो जाए या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु अथवा गंभीर बीमारी हो जाए और वह एक सप्ताह तक विद्यालय नहीं पहुंच सके, तो क्या उसे पोर्टल से हटाना न्यायसंगत कदम होगा उन्होंने इसे संवेदनहीन प्रशासनिक निर्णय बताया।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार अतिथि शिक्षकों का पहले से ही वे अल्प मानदेय, अस्थायी सेवा और भविष्य की अनिश्चितता के बीच कार्य कर रहे हैं। उन्हें न नियमित कर्मचारियों की तरह अवकाश की सुविधा मिलती है और न ही अन्य मूलभूत सेवा लाभ। ऐसे में एक सप्ताह की अनुपस्थिति को आधार बनाकर सेवा से बाहर कर देना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। इससे भय और असुरक्षा का वातावरण बनेगा, जो शिक्षा की गुणवत्ता को भी प्रभावित करेगा।
समिति द्वारा उठाए गए प्रश्नों में प्रमुख रूप से यह पूछा गया है कि क्या अतिथि शिक्षक कभी बीमार नहीं हो सकते क्या उनकी कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं होती यदि किसी शिक्षक के साथ दुर्घटना हो जाए तो क्या बिना जांच और सुनवाई के उसकी आजीविका छीन लेना उचित है संगठन ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी भी कार्रवाई से पहले लिखित सूचना, स्पष्टीकरण का अवसर और निष्पक्ष जांच अनिवार्य होनी चाहिए।
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े जानकारों का भी मानना है कि विद्यालयों में रिक्त पदों की समस्या, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक अनियमितताओं जैसी चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। इन नीतिगत कमियों का समाधान करने के बजाय यदि संपूर्ण जिम्मेदारी अतिथि शिक्षकों पर डाल दी जाती है तो यह व्यवस्था को और कमजोर करेगा। अतिथि शिक्षक ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई विद्यालय ऐसे हैं जहां नियमित शिक्षक पदस्थ नहीं हैं और अतिथि शिक्षकों के भरोसे ही शिक्षण कार्य संचालित होता है।
पी.डी. खैरवार ने स्पष्ट किया कि आदेश क्रमांक क्रं./अ.शि./2025-26/467, भोपाल दिनांक 20 फरवरी 2026 को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाना चाहिए या उसमें मानवीय संशोधन किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि यदि कोई शिक्षक सात दिन से अधिक अनुपस्थित रहता है तो पहले कारण पूछा जाए, दस्तावेज लिए जाएं और संतोषजनक उत्तर मिलने पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए। सीधे पोर्टल से रिलीव करना कठोर और अन्यायपूर्ण है।
अतिथि शिक्षक परिवारों में इस आदेश को लेकर गहरी चिंता देखी जा रही है। उनका कहना है कि पहले ही रोजगार की स्थिरता न होने से वे मानसिक दबाव में रहते हैं। अब इस प्रकार के आदेश से नौकरी जाने का डर और बढ़ जाएगा। भय और असुरक्षा के माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना वास्तविकता से परे है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं करती तो अतिथि शिक्षक लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों की रक्षा हेतु आंदोलन को तेज करने के लिए बाध्य होंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से समाधान निकालना है। वे चाहते हैं कि सरकार संवेदनशीलता दिखाए और अतिथि शिक्षकों के योगदान को सम्मान दे।
मण्डला सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में इस मुद्दे पर बैठकें आयोजित की जा रही हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में सरकार के सहयोगी हैं, विरोधी नहीं। अतः नीतियां बनाते समय जमीनी वास्तविकताओं और मानवीय पक्षों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।
अब देखना यह होगा कि सरकार अतिथि शिक्षकों की मांगों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है। फिलहाल प्रदेश के लाखों अतिथि शिक्षक इस आदेश के संशोधन या निरस्तीकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि वे बिना भय के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।

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