मध्यप्रदेश देश में शिशु मृत्यु दर में नंबर 1, नैनपुर अस्पताल की लापरवाही और भी चिंताजनक

 

रेवांचल टाईम्स – मंडला जिले में हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में प्रति 1,000 नवजातों में से 40 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाते। यह आंकड़ा राज्य को देश में शिशु मृत्यु दर (IMR) में सबसे खराब स्थिति में खड़ा करता है। इस राष्ट्रीय संकट के बीच नैनपुर सिविल अस्पताल की समर्पित बाल चिकित्सा इकाई (Dedicated Paediatric Care Unit) की स्थिति और भी चिंताजनक है।

वही नैनपुर सिविल अस्पताल में नियुक्त दो शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी के बावजूद इलाज की गुणवत्ता बेहद खराब है। इन दोनों में से एक डॉक्टर स्वयं खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) हैं, फिर भी दोनों डॉक्टर अस्पताल के बजाय अपने निजी क्लीनिक में समय देना ज्यादा उचित समझते हैं। इसका सीधा असर नवजातों और बच्चों के इलाज पर पड़ रहा है।

वही सूत्रों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 70% से अधिक शिशु रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं और 120 अस्पतालों में ही सीजेरियन डिलीवरी की सुविधा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में 15% अधिक है। नैनपुर जैसे कस्बों में तो स्थिति और भी बदतर है, जहाँ न सुविधाएं पर्याप्त हैं और न ही जवाबदेही तय है।

एक स्थानीय निवासी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “यहाँ दो-दो डॉक्टर हैं, फिर भी हमें जब बच्चे बीमार पड़ते हैं तो या तो मंडला जाना पड़ता है या निजी क्लीनिक में मोटी फीस चुकानी पड़ती है। सरकारी सुविधा बस नाम की रह गई है।”

विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक डॉक्टरों को उनकी प्राथमिक जिम्मेदारियों के लिए जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा और निजी प्रैक्टिस पर सख्ती नहीं होगी, तब तक सरकारी बाल चिकित्सा इकाइयाँ कागजों में ही चलती रहेंगी।

क्या स्वास्थ्य विभाग उठाएगा कोई कदम?
अब यह देखना अहम होगा कि क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस लापरवाही का संज्ञान लेते हैं, या फिर नैनपुर जैसे कस्बों में नवजातों की जान यूँ ही जोखिम में डालते रहेंगे।

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