मीडिया की सजगता का असर डीपीआई भोपाल को वापस लेना पड़ा अतिथि शिक्षकों के खिलाफ जारी आदेश

 

रेवांचल टाइम्स मण्डला। प्रदेश के हजारों अतिथि शिक्षकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। 20 फरवरी 2026 को जारी वह आदेश, जिसने एक सप्ताह की अनुपस्थिति पर अतिथि शिक्षकों को बिना सुनवाई सेवा से पृथक करने का अधिकार संस्था प्रमुखों को दे दिया था, अब निरस्त कर दिया गया है। 26 फरवरी 2026 को नया आदेश जारी कर पूर्व आदेश को वापस ले लिया गया। इस घटनाक्रम ने ना केवल प्रशासनिक हलकों में हलचल मचाई, बल्कि यह भी साबित किया कि समय पर उठी मीडिया की आवाज असरदार साबित होती है।
जानकारी के अनुसार, 20 फरवरी को जारी आदेश में यह प्रावधान किया गया था कि यदि कोई अतिथि शिक्षक लगातार एक सप्ताह अनुपस्थित रहता है तो संस्था प्रमुख उसे बिना कारण बताओ नोटिस या विस्तृत जांच के सेवा से अलग कर सकता है और उसका नाम पोर्टल से हटाया जा सकता है। इस आदेश को लेकर प्रदेशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। अतिथि शिक्षकों ने इसे एकतरफा, कठोर और अधिकारों का हनन करने वाला निर्णय बताया।
मण्डला जिले में इस आदेश के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठी। स्थानीय स्तर पर शिक्षकों ने मीडिया से संपर्क कर अपनी चिंता जाहिर की। समाचार प्रकाशित होते ही मामला तेजी से तूल पकड़ने लगा। प्रदेश के विभिन्न जिलों से भी विरोध के स्वर मुखर होने लगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी आदेश की आलोचना शुरू हो गई। शिक्षकों का कहना था कि यह निर्णय उन्हें असुरक्षित और अस्थिर बना देगा, क्योंकि पहले भी छोटी-मोटी शिकायतों या व्यक्तिगत मतभेदों के आधार पर कई अतिथि शिक्षकों को कार्य से पृथक किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
मध्यप्रदेश अतिथि शिक्षक समन्वय समिति के संस्थापक एवं मण्डला अतिथि शिक्षक परिवार के जिला अध्यक्ष पी. डी. खैरवार ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मीडिया की सक्रियता और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के कारण ही शासन को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना पड़ा। उन्होंने कहा, “यदि यह आदेश लागू रहता तो हजारों अतिथि शिक्षकों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा जाते। बिना सुनवाई सेवा से हटाने का अधिकार किसी भी संस्था प्रमुख को देना न्यायसंगत नहीं था।”
उन्होंने आगे कहा कि अतिथि शिक्षक पहले से ही अस्थायी व्यवस्था में कार्य करते हैं। उन्हें न तो स्थायी सेवा का लाभ मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा की ठोस गारंटी। ऐसे में यदि एक सप्ताह की अनुपस्थिति को आधार बनाकर उन्हें सीधे पोर्टल से हटाया जाता, तो यह उनके रोजगार पर सीधा प्रहार होता। कई बार बीमारी, पारिवारिक आपातस्थिति या अन्य वास्तविक कारणों से अनुपस्थिति हो सकती है। ऐसे मामलों में बिना पक्ष सुने कार्रवाई करना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
शिक्षकों का यह भी कहना है कि विद्यालयों में कार्यरत अतिथि शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित शिक्षकों की कमी के बीच वही शिक्षण कार्य संभालते हैं। इसके बावजूद उनकी सेवा शर्तें स्पष्ट और सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे आदेश उनके मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं।
प्रदेश के विभिन्न जिलों से मिली जानकारी के अनुसार, आदेश के विरोध में ज्ञापन सौंपने की तैयारी की जा रही थी। कई जिलों में शिक्षक संगठनों ने सामूहिक बैठकें भी कीं। हालांकि, आदेश वापस लिए जाने के बाद फिलहाल आंदोलन की रूपरेखा को स्थगित कर दिया गया है। शिक्षकों ने इसे अपनी एकजुटता और मीडिया की ताकत की जीत बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रशासनिक आदेश में संतुलन और पारदर्शिता आवश्यक है। यदि संस्था प्रमुख को पूर्ण अधिकार दे दिए जाएं और अपील या पुनर्विचार की कोई स्पष्ट व्यवस्था न हो, तो दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। अतिथि शिक्षकों के मामले में भी यही आशंका सामने आई थी। इसलिए शासन द्वारा आदेश निरस्त करना एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
पी. डी. खैरवार ने कहा कि यह केवल आदेश वापसी की जीत नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने प्रदेशभर के मीडिया प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि निष्पक्ष पत्रकारिता ने हजारों परिवारों को असमंजस और भय की स्थिति से बाहर निकाला है।
हालांकि, शिक्षकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे भविष्य में सेवा शर्तों को स्पष्ट और सुरक्षित बनाने की मांग जारी रखेंगे। उनका कहना है कि बार-बार अस्थिरता की स्थिति बनना शिक्षा व्यवस्था के लिए भी ठीक नहीं है। यदि अतिथि शिक्षक स्वयं असुरक्षित महसूस करेंगे, तो उसका प्रभाव शिक्षण गुणवत्ता पर भी पड़ेगा।
फिलहाल 26 फरवरी को जारी नए आदेश ने प्रदेशभर के अतिथि शिक्षकों को राहत की सांस दी है। अब उनकी नजर इस बात पर है कि आगे शासन स्थायी और न्यायपूर्ण नीति बनाने की दिशा में कदम उठाए। यह घटनाक्रम इस बात का उदाहरण बन गया है कि जागरूक समाज, सक्रिय मीडिया और संगठित प्रयास मिलकर प्रशासनिक निर्णयों में बदलाव ला सकते हैं।
मण्डला से उठी आवाज ने भोपाल तक असर दिखाया और एक सप्ताह के भीतर आदेश वापस लेना पड़ा। अब देखना होगा कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा न बनें और अतिथि शिक्षकों को स्थिर एवं सम्मानजनक कार्य वातावरण मिल सके।

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