मंडला जिला जेल फिर विवादों के घेरे में

बंदियों से बाहरी और निजी कार्य करवाए जाने के लग रहें है आरोप

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला। जिला जेल मंडला पर फिर से इन दिनों एक  गंभीर आरोपों के चलते सुर्खियों में है। जेल प्रशासन पर मध्यप्रदेश कारागार नियम 1968 की अनदेखी करते हुए बंदियों से अवैध श्रम कराने, उन्हें जेल परिसर से बाहर ले जाकर कार्य में लगाने और निजी काम करवाने जैसे आरोप लगे हैं। पूरे मामले की शिकायत भोपाल स्थित महानिदेशक कारागार को भेजी गई है, जिसके बाद विभागीय हलचल तेज हो गई है।

 

*निर्माण कार्य में बंदियों से श्रम, वित्तीय गड़बड़ी की आशंका*

 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंडला जेल और नई जेल निर्माण से जुड़े कार्यों में ठेकेदार के बजाय बंदियों और सिविल बंदियों से काम लिया जा रहा है। आरोप है कि कागज़ों में मजदूरी भुगतान ठेकेदार को दर्शाया जा रहा है, जबकि वास्तविक कार्य बंदियों से कराया जा रहा है। इससे सरकारी धन के दुरुपयोग और संभावित वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है।

 

*हत्या के आरोपी से बाहर काम, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल*

 

सबसे गंभीर आरोप यह है कि धारा 302 (हत्या) के विचाराधीन बंदी को जेल से बाहर ले जाकर विद्युत कार्य में लगाया जा रहा है। जेल नियमों के अनुसार विचाराधीन बंदियों को बिना सक्षम अनुमति और सुरक्षा के बाहर ले जाना प्रतिबंधित है। ऐसे में यह मामला जेल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 

*घरेलू कार्यों में बंदियों के उपयोग के आरोप*

 

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ बंदियों से निजी एवं घरेलू कार्य—जैसे सामान उठवाना और अन्य व्यक्तिगत कार्य—कराए जा रहे हैं। यह कारागार नियमों के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से बंदियों से निजी लाभ लेना प्रतिबंधित है।

 

*मजदूरी और अभिलेखों में पारदर्शिता पर सवाल*

 

वही मजदूरी भुगतान प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। मजदूरी रजिस्टर, उपस्थिति और वास्तविक भुगतान के बीच अंतर होने की आशंका जताई गई है। साथ ही निर्माण कार्य में भुगतान और वास्तविक काम के बीच अंतर संभावित घोटाले की ओर इशारा करता है।

 

*निकासी प्रक्रिया और रजिस्टर संधारण पर संदेह*

 

वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार बंदियों को जेल से बाहर ले जाने के दौरान प्रवेश-द्वार रजिस्टर, निकासी आदेश और सुरक्षा प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है। शिकायत में इन प्रक्रियाओं के सही तरीके से पालन न होने की आशंका जताई गई है।

 

*सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने की मांग*

 

वही मामले की निष्पक्ष जांच के लिए जेल परिसर, मुख्य द्वार और निर्माण स्थल के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग की गई है। माना जा रहा है कि यही रिकॉर्डिंग सच्चाई सामने ला सकती है।

 

*उच्च स्तरीय जांच की मांग*

 

मामले की गंभीरता को देखते हुए मजदूरी रजिस्टर, भुगतान अभिलेख, ठेका दस्तावेज और उपस्थिति रिकॉर्ड की जांच के साथ उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। अब सभी की नजर जेल विभाग की कार्रवाई पर टिकी है।

 

*जेल या बहुउद्देश्यीय सेवा केंद्र?”*

 

मंडला की जेल अब शायद “सुधार गृह” से आगे बढ़कर “सेवा केंद्र” बन चुकी है। यहां कैदी सिर्फ अपनी सजा नहीं काटते, बल्कि बहु-उपयोगी संसाधन बन चुके हैं—कभी मजदूर, कभी इलेक्ट्रिशियन, तो कभी घरेलू सहायक!

 

ठेकेदारों को भी राहत—अब मजदूर ढूंढने की जरूरत नहीं, जेल में ही पूरा “वर्कफोर्स पैकेज” उपलब्ध है। कागज़ों में मजदूरी इधर, काम उधर—और सिस्टम खुश।

 

और सुरक्षा? वो तो “विश्वास” पर चल रही है। हत्या के आरोपी भी यदि अब खुले आसमान के नीचे काम कर रहे हैं—शायद सुधार प्रक्रिया का नया मॉडल यही है!

 

अब सवाल ये है कि ये जेल है या “स्टार्टअप इंडिया” का कोई नया प्रयोग—जहां संसाधन कम और जुगाड़ ज्यादा चलता है।

 

लगाए गए आरोप यदि सही है और सच है इसके साथ ही मंडला जेल का यही हाल रहा, तो आने वाले समय में बोर्ड लग सकता है—

“मंडला जिला जेल: काम भी, आराम भी, और सिस्टम के साथ पूरा सहयोग भी!”

 

इनका कहना है-

 

विगत कुछ दिनों के लिए मैं अपने निजी काम को लेकर छुट्टियों में था, इस दौरान उप जेल अधीक्षक को प्रभार दिया गया था,, हो सकता है उनके द्वारा ऐसा कोई कार्य करवाया गया हो परन्तु मेरे रहते ऐसा कोई काम कभी नहीं करवाया गया।

संजय सहलाम

जेल अधीक्षक मंडला

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