सांदीपनी विद्यालय में पेड़ कटे, लकड़ी हजम पंचायत पर “हरित लूट” के आरोप,

रेवांचल टाइम्स घुघरी मंडला सरकार जहां एक ओर शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, गांव-गांव स्कूल भवन खड़े किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत एक बार फिर सवालों के कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। ग्राम घुघरी स्थित सांदीपनी विद्यालय में नए भवन निर्माण से पहले काटे गए हरे-भरे पेड़ों का मामला अब “हरित लूट” का रूप ले चुका है। पेड़ कटे, लकड़ी गायब—और जिम्मेदार हाथ झाड़कर किनारे!
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार मामला सीधा है, लेकिन जवाब गोलमोल। विद्यालय परिसर में जहां भवन निर्माण प्रस्तावित था, वहां पहले से खड़े छायादार पेड़ों में से करीब आधा दर्जन पेड़ों को काटा गया। यह कार्य ग्राम पंचायत घुघरी द्वारा मजदूर लगाकर किया गया, जिसकी औपचारिक अनुमति भी ली गई थी। लेकिन असली खेल पेड़ कटने के बाद शुरू हुआ।
कटाई के दौरान पंचायत ने दावा किया था कि पेड़ों से निकली लकड़ी का उपयोग सार्वजनिक कार्यों में किया जाएगा—गांव के हित में, जनहित में। लेकिन अब हालात यह हैं कि लकड़ी का कोई हिसाब किताब नहीं, कोई रिकॉर्ड नहीं, कोई जवाब नहीं।
सवाल उठता है आखिर लकड़ी गई कहां
प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों के अनुसार, पेड़ों से निकली लकड़ी की मात्रा मामूली नहीं थी। अनुमान है कि चार से पांच ट्रैक्टर-ट्रॉली भरकर लकड़ी निकली थी। इतनी बड़ी मात्रा का “गायब” हो जाना अपने आप में बड़ा संदेह पैदा करता है। क्या इतनी लकड़ी हवा में उड़ गई। या फिर किसी के “निजी खजाने” में पहुंच गई
गांव में चर्चा है कि पंचायत की मिलीभगत से लकड़ी को गुपचुप तरीके से किसी व्यक्ति को सौंप दिया गया। आरोप यह भी हैं कि इस पूरे खेल में लेन-देन हुआ और सार्वजनिक संपत्ति को निजी लाभ में बदल दिया गया। हालांकि पंचायत के जिम्मेदार इस पर चुप्पी साधे हुए हैं या फिर बयानबाजी में उलझे हुए हैं।
विद्यालय प्राचार्य साफ कहते हैं कि उन्होंने केवल एनओसी ली थी, पेड़ कटवाने और आगे की जिम्मेदारी पंचायत की थी। वहीं पंचायत सचिव का बयान और भी चौंकाने वाला है उनका कहना है कि “लकड़ी गांव वाले ले गए।” अब सवाल यह है कि क्या ग्राम पंचायत इतनी कमजोर है कि चार-पांच ट्रॉली लकड़ी ग्रामीण बिना रोक-टोक उठा ले जाएं या फिर यह बयान सच्चाई से बचने का एक आसान रास्ता है
ग्रामीण इस पूरे घटनाक्रम को सीधे-सीधे भ्रष्टाचार मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर लकड़ी का उपयोग सार्वजनिक कार्यों में होना था, तो उसका रिकॉर्ड होना चाहिए था, पंचायत के पास उसका हिसाब होना चाहिए था। लेकिन यहां तो “कटाई वैध, लेकिन कमाई गुप्त” का खेल नजर आ रहा है।
यह मामला सिर्फ लकड़ी का नहीं, बल्कि विश्वास का है। जब पंचायत स्तर पर ही पारदर्शिता गायब हो जाए, तो विकास कार्यों की विश्वसनीयता खुद-ब-खुद कटघरे में आ जाती है। सरकार योजनाएं बना रही है, पैसा दे रही है, लेकिन अगर जमीनी स्तर पर ही बंदरबांट हो रही है, तो इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
पर्यावरण के नजरिए से भी यह मामला गंभीर है। जिन पेड़ों को काटा गया, वे वर्षों पुराने थे। यदि उन्हें काटना अनिवार्य था, तो उनके बदले पौधारोपण या लकड़ी के उचित उपयोग की योजना बननी चाहिए थी। लेकिन यहां तो पेड़ कटे और उनकी “कहानी” भी खत्म कर दी गई।
इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यह पता लगाया जाए कि लकड़ी आखिर कहां गई, किसे दी गई और किस आधार पर दी गई। यदि कोई अनियमितता या भ्रष्टाचार सामने आता है, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अब यह मामला केवल एक गांव की पंचायत का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम पर सवाल उठाने लगा है। क्या विकास के नाम पर इस तरह “हरित संपत्ति” की लूट जारी रहेगी या फिर जिम्मेदारों पर लगाम कसी जाएगी
फिलहाल, सांदीपनी विद्यालय के कटे पेड़ और गायब लकड़ी एक ऐसा सवाल बन चुके हैं, जिसका जवाब हर ग्रामीण जानना चाहता है कि आखिर लकड़ी गई कहां
इनका कहना
पंचायत के द्वारा पेड़ों की कटाई कार्य किया गया है उस दौरान में केन्द्राध्यक्ष रामनगर में था पंचायत ने पेड़ों की कटाई करवाकर लकड़ी ले गए।
महेन्द्र चौधरी
प्राचार्य सांदीपनी विद्यालय घुघरी

पंचायत के द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया गया हैं कटाई के बाद लकड़ी को मोहल्ले वाले ले गए ।

शिवदास बैरागी
सचिव घुघरी

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