15 साल का मासूम सट्टे की दुकान तक पहुंच जाता है, पुलिस नहीं खोज पा रही ठिकाने
जबलपुर में सट्टे का साम्राज्य: 15 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक जकड़े, प्रशासन बेखबर!

दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर। (अतुल कुमार) जबलपुर शहर में अवैध सट्टे का कारोबार अपनी जड़ों को इतनी गहराई तक फैला चुका है कि अब इसे रोकना प्रशासन और पुलिस के लिए चुनौती बनता जा रहा है। हालात यह हो गए हैं कि 15 साल का मासूम बच्चा भी सट्टे की दुकान का रास्ता खोज लेता है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और पुलिस इस कारोबार की दुकानों को खोज पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

शहर के हर कोने—चाहे वह गली-मोहल्ला हो, पान की दुकान हो, सब्जी की ठेली हो या फिर किराना स्टोर—हर जगह सट्टा पट्टी लिखने का काम धड़ल्ले से चल रहा है। मोबाइल फोन के जरिए सट्टा लगाने की सुविधा ने इस अवैध कारोबार को और पंख दे दिए हैं। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि सट्टे का जाल 15 साल के बच्चों से लेकर 80 साल के बुजुर्गों तक को अपनी गिरफ्त में ले चुका है।
प्रशासन की अनदेखी, पुलिस की चुप्पी
शहर के हर इलाके में सट्टे का कारोबार खुल्लमखुल्ला चल रहा है, लेकिन प्रशासन और पुलिस की नींद अभी तक नहीं टूटी है। लोगों का कहना है कि सट्टा माफिया पुलिस की नाक के नीचे अपना खेल खेल रहा है, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही। ऐसा प्रतीत होता है मानो सट्टा माफियाओं को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त हो।
सट्टे से बर्बाद हो रहे परिवार
सट्टे की लत ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए हैं। लोग अपनी मेहनत की कमाई को इस दलदल में झोंक रहे हैं और कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। सट्टे की वजह से घरों में कलह बढ़ रही है और सामाजिक ताना-बाना टूट रहा है।
आखिर कब जागेगा प्रशासन?
जबलपुर के जागरूक नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि सट्टे के इस गोरखधंधे पर अविलंब सख्त कार्रवाई की जाए। मोबाइल और ऑनलाइन माध्यम से चल रहे सट्टे पर भी निगरानी रखी जाए ताकि युवा पीढ़ी को इस दलदल से बचाया जा सके।
जबलपुर के नागरिकों की आवाज
> “सट्टे ने घर बर्बाद कर दिए। पुलिस वालों को सब पता है, फिर भी आंखें मूंदे बैठे हैं। अगर प्रशासन चाहे तो सट्टा माफिया का जाल चुटकी में तोड़ सकता है।” — एक जागरूक नागरिक