ग्राम पंचायत घोट में खुला लूट का खेल 100 मीटर में दो स्टॉप डेम सूखे,

पानी टंकी निजी घर में, फर्जी बिलों से लाखों का बंदरबांट

रेवांचल टाइम्स बिछिया मंडला जिले के बिछिया जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत घोट इन दिनों विकास नहीं, बल्कि खुलेआम भ्रष्टाचार और लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है। यहां सरकारी योजनाओं के नाम पर लाखों रुपये की रकम खर्च तो कर दी गई, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न पानी है, न सुविधा सिर्फ कागजों में विकास और असल में सरकारी खजाने की लूट।
सबसे चौंकाने वाला मामला कहवा टोला का है, जहां एक ही नाले में मात्र 100 मीटर की दूरी पर दो-दो स्टॉप डेम खड़े कर दिए गए। यह निर्माण इस तरह किया गया मानो योजना का उद्देश्य पानी रोकना नहीं, बल्कि बजट खत्म करना हो। हालत यह है कि दोनों स्टॉप डेम पूरी तरह सूखे पड़े हैं नाले में एक बूंद पानी तक नहीं। आखिर पानी रोकने के लिए प्लेट नही लगाई गई क्या पानी टंकी की तरह प्लेट का निजी उपयोग किया जा रहा है सवाल उठता है कि जब नाले में पानी ही नहीं है, तो आखिर किस आधार पर यहां लाखों रुपये बहा दिए गए क्या यह निर्माण तकनीकी स्वीकृति के बिना किया गया या फिर जानबूझकर फर्जी काम दिखाकर राशि निकाल ली गई
ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही पैसा सही जगह और सही योजना के तहत लगाया जाता, तो गांव में पानी की समस्या काफी हद तक हल हो सकती थी। लेकिन यहां विकास के नाम पर सिर्फ “कागजी खेल” खेला गया है।
ग्राम पंचायत में पेयजल योजना की हालत भी इससे कम शर्मनाक नहीं है। पंचायत में लाखों रुपये खर्च कर पानी की टंकी लगाई गई, नल लगाए गए, लेकिन आज यह पूरी व्यवस्था दम तोड़ चुकी है। टूटे हुए नल पड़े हैं, पंचायत भवन की छत पर पाइप लटकते दिखाई दे रहे हैं—मानो खुद यह ढांचा अपनी बदहाली की कहानी बयां कर रहा हो।
सबसे गंभीर और चौंकाने वाला आरोप यह है कि सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाई गई पानी की टंकी को एक पंच के निजी घर में उपयोग किया जा रहा है। यानी जो पानी पंचायत भवन लिए था, वह अब कुछ लोगों की निजी संपत्ति बन चुका है। यह न केवल भ्रष्टाचार है, बल्कि ग्रामीणों के हक पर सीधा डाका है।
ग्राम पंचायत के संचालन पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों से जानकारी अनुसार , सरपंच केवल नाम के लिए हैं, जबकि असली नियंत्रण सचिव नूरसिंह पन्द्रों के हाथ में है। आरोप है कि सचिव ने फर्जी बिलों के जरिए लाखों रुपये का भुगतान कराया है।पांचवा वित्त आयोग से सार्वजनिक चबूतरा निर्माण जिसकी लागत तीन लाख की लागत से निर्माण कराया गया जिसे
रविन्द्र ट्रेडर्स के नाम पर रेत, मुर्रम और जेसीबी मशीन के लिए 1 लाख 20 हजार रुपये का भुगतान किया गया। इसमें 80 ट्राली मुर्रम 100 रुपये प्रति ट्राली के हिसाब से 80 हजार रुपये दर्शाए गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक छोटे से सार्वजनिक चबूतरे के निर्माण में 80 ट्राली मुर्रम की जरूरत पड़ती है या फिर यह सिर्फ कागजों में दिखाकर पैसा हड़पने का खेल है
लेकिन मौके पर न तो कार्य की गुणवत्ता दिखती है और न ही खर्च का कोई पारदर्शी हिसाब। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में भी धुंधले और अस्पष्ट बिल लगाकर भुगतान किया जा रहा है, जिससे संदेह और गहरा हो गया है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन सभी गड़बड़ियों की शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन की यह चुप्पी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का संकेत देती है। यही कारण है कि जिम्मेदार लोगों के हौसले बुलंद हैं और वे खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
एक तरफ सरकार “पानी रोको अभियान” के तहत पानी बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर ग्राम पंचायत घोट में उसी पैसे को पानी की तरह बहाकर भ्रष्टाचार की नाली में डाला जा रहा है। योजनाएं कागजों में पूरी दिखा दी जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस खुली लूट पर आंखें मूंदे रहेगा या फिर सख्त कार्रवाई करेगा। क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा
ग्रामवासियों की मांग है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, फर्जी भुगतान की वसूली की जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक “विकास” के नाम पर भ्रष्टाचार का यह खेल यूं ही चलता रहेगा और आम जनता अपने हक के लिए तरसती रहेगी।

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