सबरी और मीरां जैसी भक्ति हो तो भगवान स्वयं आ जाते हैं: मुनि श्री नीरज सागरजी
मंडला। पिंडरई की पावन नगरी में सिद्धाराधना पर्व का दूसरा दिन भक्तिभाव और तपस्या की उमंग से सराबोर रहा। मुनि श्री नीरज सागरजी की सान्निध्यता में श्रद्धालुओं ने तपस्वरूप मुनि श्री के मुखारविंद से शांति और साधना का अमृत वचन श्रवण किया।
मुनिश्री ने कहा कि जब भक्ति में सबरी और मीरां जैसी एकनिष्ठ श्रद्धा हो, तो भगवान भी स्वयं दर्शन देने आ जाते हैं। भगवान श्रीराम ने वनवासी शबरी की झोपड़ी में जाकर उसका मान बढ़ाया, यह भक्ति की पराकाष्ठा है। उन्होंने धर्म और संयम की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आत्मा को शुद्ध करने का साधन तप और साधना है। जो व्यक्ति आत्मिक विकास की राह पर चलना चाहता है, उसे त्याग, संयम और तप की राह पकड़नी चाहिए।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने नवरात्रि जैसी सात्विक श्रद्धा के साथ सिद्धाराधना पर्व की पूजा-अर्चना में भाग लिया। मुनिश्री ने जंगलों में रहने वाले जीव-जंतुओं और पशुओं की रक्षा के लिए भी संदेश दिया और कहा कि जीवदया ही सच्ची आराधना है।
मुनिश्री ने गुरु के प्रति श्रद्धा को सबसे बड़ा धर्म बताते हुए कहा, “जब साधक अपने गुरु पर अटूट विश्वास करता है, तभी उसे साधना का सच्चा फल मिलता है।” उन्होंने सिद्धाराधना पर्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह पर्व आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ माध्यम है।
अंत में मुनिश्री ने पंचकल्याणक का स्मरण कर भक्तों को धर्म, करुणा और आत्मकल्याण की राह पर चलने का संदेश दिया।