बिना दुकान, बिना स्टॉक… फिर भी लाखों का कारोबार! ग्राम पंचायतों में कागजों पर चल रहा ‘मटेरियल घोटाला’, जीएसटी सिस्टम बना ‘ढाल’
गूगल मैप पर भी नहीं मिलतीं दुकानें, फिर भी लाखों के भुगतान
रेवांचल टाइम्स मंडला जिले की अनेक ग्राम पंचायतों में सरकारी योजनाओं के अंतर्गत मटेरियल सप्लाई के नाम पर बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया जा रहा है। कई मामलों में पंचायतों द्वारा ऐसे फर्मों के बिल लगाए जाते हैं, जिनका ज़मीनी अस्तित्व ही नहीं है। इन फर्मों का कोई स्थाई ठिकाना नहीं, न कोई दुकान, न स्टॉक, न गोदाम। कई बार तो गूगल मैप पर भी इन पतों का कोई अता-पता नहीं होता।
कागज़ों में सब ‘पर्फेक्ट’, जमीन पर ज़ीरो
इन कथित फर्मों के कागजात इतने दुरुस्त होते हैं कि उन पर सवाल उठाना भी मुश्किल हो जाता है। बकायदा जीएसटी नंबर अंकित होते हैं, समय पर रिटर्न भी दाखिल किया जाता है। जब शिकायतकर्ता दुकानों की असलियत जानने निकलते हैं, तो न स्टॉक मिलता है, न गोदाम। बावजूद इसके, पंचायतें लाखों रुपये इन फर्मों को भुगतान कर देती हैं।
जीएसटी विभाग का अजीब तर्क: “दुकान दिखना जरूरी नहीं”
जब इस पूरे मामले पर जीएसटी अधिकारियों से सवाल किया गया तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। उनका कहना था कि “हर व्यापारी को दुकान खोलना जरूरी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सड़क चलते व्यापार करता है और समय पर रिटर्न भर रहा है, तो वह वैध माना जाएगा।”
ऐसे में सवाल यह है कि यदि कोई दुकान ही नहीं है, तो स्टॉक कैसे ट्रैक होगा? क्या सरकारी आपूर्ति बिना स्टोर के संभव है?
कुछ सप्लायर कभी रिटर्न ही नहीं भरते, कार्रवाई सालों से लंबित
इस भ्रष्ट तंत्र में कुछ सप्लायर ऐसे भी हैं जो कभी जीएसटी रिटर्न भरते ही नहीं, फिर भी पंचायतों में उनका मटेरियल धड़ल्ले से लगाया जाता है। जब इनके खिलाफ शिकायत होती है तो वर्षों तक जांच चलती है, लेकिन कार्रवाई ‘शून्य’ रहती है।
पंच से सरपंच तक सभी ठेकेदार, रिश्तेदारों के नाम पर फर्में
पंचायतों में सत्ता और सप्लाई का यह गठजोड़ इस कदर मजबूत है कि कई जनप्रतिनिधियों ने स्वयं या अपने रिश्तेदारों के नाम पर सप्लायर फर्म रजिस्टर्ड करवा रखी हैं।
कोई अपनी पत्नी के नाम पर फर्म चला रहा है,कोई रिस्तेदार के नाम पर,
और कुछ ने तो अपने करीबी के नाम पर भी रजिस्ट्रेशन करवा रखा है, जो शायद इस गोरखधंधे से अनजान हों।
शिकायतें, समाचार… लेकिन कार्रवाई नहीं
इस पूरे मामले को लेकर ग्रामीणों द्वारा बार-बार शिकायतें की जा रही हैं। समाचार पत्रों में भी लगातार इस घोटाले को पूरे सबूतों के साथ उजागर किया जा रहा है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिखती। कागजों पर सब ‘ठीक’ दिख रहा है, इसलिए जमीनी भ्रष्टाचार को अनदेखा किया जा रहा है।
-अब सवाल यह है…
क्या मंडला जिले की ग्राम पंचायतों में यह भ्रष्टाचार यूं ही चलता रहेगा?
या कभी कोई ईमानदार और जिम्मेदार अधिकारी आएगा जो इस तंत्र को तोड़ेगा?